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#दानवों_को_फांसी_हो: हैवानियत दानवों जैसी, तो फिर मानवाधिकार क्यों?

यह भारत देश हैं. जहां दानव भी मानव के रूप में रहते हैं. हां ! सोच क्या रहे हो. बिल्कुल सही पढ़ा हैं आपने. लेकिन डरिए मत. और अगर आप भी भारतीय हैं तो सिर को शर्म से मत झुकाइएं. बस इस लेख को पढ़ते जाइएं... क्योंकि हैवानियत की इतनी हदें पार हो चुकी है इस देश में... कि शर्म खुद सिर झुका रही हैं. उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ में आपसी रंजिस में मासूम के साथ दुष्कर्म-हत्या का मामला, इस देश का सिर्फ इकलौता और पहला नहीं हैं. इस से पहले भी कई मामले सामने आए. लेकिन हुआ क्या ? बस वहीं तुच्छ राजनीति और लीपापोती. सवाल यह नहीं हैं कि दोषियों को सबक मिला या नहीं ?   सवाल है, दोषियों की सजा से क्या सबक मिला उन्हे. जो दानव बाहर मानव का मुखौटा लिए घूम रहे हैं. और एक नये अपराधी के रूप में सामने आते हैं. यह तभी संभव होगा, जब सजा भी दानवों जैसी हो. और क्या ? यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी कि लोहा, लोहा को काटता हैं. यह कहावत यहां पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं. 10 हजार की रकम मासूम ट्विंकल के पिता नहीं चुका पाए, तो उसमें मासूम का क्या दोष ? 370 मे से 13 वर्षों में सिर्फ 4 को फांसी नेशनल क्राइम रिकॉर्...

अब भी नहीं जागें, तो यह गर्मी मार डालेगी !

देशभर में तापमान बढ़ता जा रहा हैं. गर्मी से लोगों का हाल-बेहाल हैं. हाल ही दिनों की बात करे तो राजस्थान का चूरू शहर देश के सबसे गर्म शहरों में शिखर पर हैं. देश के 145 शहरों का तापमान 50 डिग्री के पार पहुंच गया. गर्मी लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं. गर्मी के साथ दूसरी समस्या पेयजल की किल्लत भी हैं. बात करे महाराष्ट्र के मराठावाड़ा की तो कई बांध सूख चूके हैं. लोगों को नहाना-धोना तो दूर, पीने तक का पानी भी नसीब नहीं हो रहा हैं. अब सबसे बड़ा सवाल, आखिर इन समस्याओं का समाधान कैसा मिलेगा ? क्यों हर साल कई लोगों को पानी की किल्लत और गर्मी से जान से गवानी पड़ती हैं. आखिर इनका पुख्ता समाधान कब और कैसे निकलेगा ? खैर, सवाल पूछना आसान हैं. लेकिन समाधान ढूंढना आसान कार्य नहीं होता हैं.   आपके मन में अभी सवाल होगा कि आखिर समाधान कैसे निकलेगा. देखो !   किसी भी समस्या के कारण को हटा देने से समाधान अपने आप निकल जाता हैं. तो बस पहले यह जान लिजिए कि गर्मी आखिर क्यों बढ़ रही हैं. क्यों बढ़ रही है यह गर्मी ऐसा नहीं हैं कि सिर्फ भारत में तापामान वृद्धी देखने को मिल रही ह...

एक बार फिर मोदी सरकार, तो क्या EVM में गड़बड़ी हुई ?

नतीजे आ गए. एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 300 प्लस सीटें हासिल की. और खुद बीजेपी ने 303 सीटें हासिल की है. वहीं यूपीए सिर्फ 96 सीटों पर और कांग्रेस 52 सीटों पर सिमट कर रह गई हैं. इसी बीच एक बार  फिर  EVM  को विपक्ष मुद्दा बना रहा हैं. आपको बता दे कि नतीजों के एक दिन पहले विपक्ष की 22 पार्टियां इसी मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग के बाहर प्रदर्शन किया था.  लेकिन चुनाव आयोग ने विपक्ष की सारी बातों को सिरे से खारिज कर दिया था. एक बात और , EVM   को लेकर पहले से ही विपक्ष सवाल उठाता रहा है. तो क्या विपक्ष, मुद्दा नहीं होने के कारण और हार का सामने होने से सवाल उठाता हैं  ? या फिर वाकई  EVM  में गड़बड़ी ,  सुरक्षा में सेंध लगाकर की जाती हैं  ?  यह सबसे बड़े सवाल हैं.  क्योकि 2014 के बाद पांच साल मोदी सरकार रहीं. तो क्या पांच साल में मोदी सरकार ने इतना तोड़ निकाल लिया कि  EVM   में सेंधमारी की जा सकती हैं  ? इन सारे सवालों के बीच सवाल यह भी उठता हैं कि आखिर मोदी सरकार में ही  EVM   को...

युवाओं की असभ्य होती भाषा

दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में भाग-दौड़ व रफ़्तार भरी जीवन शैली में चिड़चिड़ापन होना अब स्वभाविक हैं. लेकिन इसके साथ खासकर युवाओं में बोल-चाल की भाषा में परिवर्तन दिख रहा हैं. या यूं कहें आज की युवा पीढ़ी की आपस में बोल-चाल की भाषा असभ्य हो गई हैं. अगर आप मेरी तरह युवा हैं तो इस बात को आसानी से महसूस भी कर रहे होगें. और हो सकता हैं कि आप भी अपने दोस्तों की असभ्य और भूहड़ शब्दों से परेशान होगें. मजाक में मां-बहन से लेकर पता नहीं क्या-क्या आज की युवा पीढ़ी दोस्तों के साथ आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. खैर यह अलग बात हैं कि यह सिर्फ ज्यादातर दोस्तों के समूह में होता हैं.   लेकिन याद रखना , कहीं भी हो. आखिर भाषा की मर्यादा तो लांघी जा रही हैं. यह एक तरह से भारतीय संस्कृति को ठेस पहुंचाना हैं. अगर इसे सुधारने की पहल नहीं की गई तो आने वाले वक्त में यह एक बड़ी समस्या बन जाएगी. गंदे लफ़्ज की जड़ कहां यह  सवाल आपके मन में भी होगा. आख्रिर हम इतने असभ्य क्यों होते जा रहें हैं. यह बात कह सकते हैं कि महानगरों में तनाव व निरस भरी जिंदगी में व्यक्ति परेशानी के चलते अप...

2019 में मोदीजी को यह मुद्दें ले डूबेंगे ? : नज़रिया

हमारे देश में लोकसभा चुनाव कई मायनों में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं , जब देश के सामने कई बड़े मुद्दें और पीएम मोदी जैसे चेहरे की पांच साल की साख दाव पर हो. आपको याद होगा कि 2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव की बाजी हार गई थी. 14 राज्यों में देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी   ‘ कांग्रेस ’   खाता तक नहीं खोल पाई थी. भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक यूपीए-2 (2014 से पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार) के 94 फीसदी मंत्री सांसद का चुनाव हार गए थे. यानी मोदी लहर के चलते कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था. वहीं बात करें बीजेपी की तो 2014 में बीजेपी की अब तक का सबसे बड़ी जीत थी. उस वक्त एनडीए में बीजेपी के साथ 29 दल साथ होने के बावजूद भी , बीजेपी अकेली सरकार बनाने में समर्थ थी. बहुमत के आंकड़े 272 को छूते हुए बीजेपी ने 282 सीट पर कब्जा किया था. लेकिन इस बार 2019 में बात कुछ अलग हैं. जिस चेहरे के दम पर बीजेपी ने इतना अच्छा 2014 में अब तक का प्रदर्शन किया था , तो क्या पीएम नरेन्द्र मोदी का पांच साल काम काजों का रिपोर्ट कार्ड जनता को पसंद आएगा   ?...

तस्वीर-ए-बयां : बाइक, टीवी सब लेकिन सिर ढक्कनें के लिए नहीं हैं छत

यह दोनो तस्वीरें दिल्ली एनसीआर के एरिया‌ की हैं। पहली तस्वीर भूमीहीन परिवारों की‌ मजबुरी को बयां कर रही हैं। वहीं दुसरी तस्वीर परिवार के हालातों को व्यक्त कर रही हैं। बड़ा अचरज होता है कि टीवी तक हैं लेकिन जमीन नहीं होने के कारण पक्का घर नहीं बना पा रहे हैं।

कोबरापोस्ट स्टींग ऑपरेश़न : बॉलीवुड पर जनता की राय, बोले‌- मीडिया‌ खुद बिकाऊ‌ हैं

इस वीडियो‌ को यूट्यूब भी देखा जा सकता हैं -  Youtube/DelhiTV