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2019 में मोदीजी को यह मुद्दें ले डूबेंगे ? : नज़रिया

हमारे देश में लोकसभा चुनाव कई मायनों में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब देश के सामने कई बड़े मुद्दें और पीएम मोदी जैसे चेहरे की पांच साल की साख दाव पर हो. आपको याद होगा कि 2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव की बाजी हार गई थी. 14 राज्यों में देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी. भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक यूपीए-2 (2014 से पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार) के 94 फीसदी मंत्री सांसद का चुनाव हार गए थे. यानी मोदी लहर के चलते कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था.

pm modi , modi 2019 ke mudde, मोदी के 2019 के चुनावी मुद्दे


वहीं बात करें बीजेपी की तो 2014 में बीजेपी की अब तक का सबसे बड़ी जीत थी. उस वक्त एनडीए में बीजेपी के साथ 29 दल साथ होने के बावजूद भी, बीजेपी अकेली सरकार बनाने में समर्थ थी. बहुमत के आंकड़े 272 को छूते हुए बीजेपी ने 282 सीट पर कब्जा किया था.

लेकिन इस बार 2019 में बात कुछ अलग हैं. जिस चेहरे के दम पर बीजेपी ने इतना अच्छा 2014 में अब तक का प्रदर्शन किया था, तो क्या पीएम नरेन्द्र मोदी का पांच साल काम काजों का रिपोर्ट कार्ड जनता को पसंद आएगा वो वादें क्या जनता को याद हैं, जिनके दम पर बीजेपी को भारी मत मिले थें. वो वादें क्या थें ? आपको याद हैं!

एक बार उन वादों और मुद्दें पर भी नजर डाल लेते हैं, जो 2014 में बीजेपी के थे. आतंकवाद, भ्रष्टाचार, कालाधन, मंहगाई और बेरोजगारी 2014 में बीजेपी के प्रमुख मुद्दे थें. अब हर किसी के मन में यह सवाल हैं कि इन मुद्दों पर पांच साल में बीजेपी सरकार यानी पीएम मोदी कितने खरें उतरें.

इन मुद्दों की उस वक्त क्या स्थिति थी और अब क्या स्थिति हैं. साथ में यह भी कि 2019 के चुनाव में क्या मुद्दें रहने वालें जो पीएम मोदी पर भारी पड़ सकते हैं तथा फिर पीएम बनने की डगर को कठिन कर सकते हैं. आइए जानते हैं.

नोटबंदी: 99 फीसदी नोट वापस आ गए

आपको 8 नवम्बर की रात याद होगी, जब पीएम मोदी ने आश्चर्यजनक रूप से ठीक आठ बजे टीवी पर पांच सौ और एक हजार के नोट पर बैन होने का एलान कर दिया था. रातोंरात पूरा देश सड़कों पर आ गया. कई लोग बैंक की लाइन में खड़े रहते ही मौत के शिकार हो गए थे.


यूपी में गर्भवती महिला की बैंक लाइन में ही डिलीवरी हो गई. बाद में यूपी के पूर्व सीएम तथा सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बच्चें को गोद लिया और उसका नाम भी खजांची रखा. इस तरह से आम जनता ने कई परेशानियां नोटबंदी के दौरान झेली थी.

नतीजा यह रहा, आरबीआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 99 फीसदी से अधिक नोट वापस बैंको में आ गए. यानी नोटबंदी के दौरान केवल एक फीसदी से भी कम कालाधन सामने आया. जाने-माने कई अर्थशास्त्रियों ने भी नोटबंधी को विफल करार दिया. तत्कालीन आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन ने एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ी लेकिन भारत में नोटबंदी के वजह से इसका उल्टा हुआ. सकल घेरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर भी भारत में सुस्त हो गई.

जीएसटी तकनीकी सर्वर से लेकर उपयोग तक कई खामियां

एक देश एक कर की तर्ज पर जीएसटी को लाया गया. पीएम मोदी के इस कदम को कर चोरी पर लगाम की पहल की तौर पर देखा जा रहा था. भले ही एक कर एक देश और भ्रष्टाचार की खत्म करने की भावना जुड़ी हो. परन्तु दुसरा सच यह भी हैं कि जीएसटी जुलाई 2017 में जब लागू हुई, तब से छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारियों को कई परेशानियों से दो-चार होना पड़ा. 

शुरूआत में तो जीएसटी व्यापारियों की समझ से परे थी. समझने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा. भले ही अब 2019 आ गया, लेकिन अभी भी सर्वर से लेकर कई सिस्टम तक को समझने बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं. संक्षेप में कहे तो व्यापारी वर्ग मोदीजी से काफी नाराज हैं. इसका असर भी 2019 के आम चुनाव में नहीं पड़ेगा. यह कहना ठीक नहीं रहेगा.

बेरोजगारी को लेकर युवाओं में जबरदस्त गुस्सा

2014 के आम चुनाव में  एक रैली के सम्बोधन में हर साल 2 करोड़ रोजगार देने की बात कहीं थी. इस वादे को पुरा करने में मोदी सरकार नाकाम रहीं. कांग्रेस का आरोप हैं कि पिछले साल एक करोड़ युवाओं को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

लेकिन दुसरा पहलू यह भी हैं कि समय के साथ पुरानी नौकरियां खत्म हो रही हैं. और नई तकनीक के आधार पर नई नौकरियां पैंदा भी हो रही हैं. लेकिन स्किल्स की कमी के चलते, जिस तरह से युवाओं को नौकरी गंवानी पड़ रही हैं. इसी संख्याबल मुकाबले युवाओं को नई जॉब नहीं मिल पा रहीं हैं. मिल भी पा रही हैं तो ज्यादातर युवा वेतन से असंतुष्ट होने के कारण जॉब करना पंसद नहीं करते हैं.

वहीं आंकड़ो पर नजर डाले तो एनएसएसओ के अनुसार साल 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1% थी. जो कि पिछले करीब 45 सालों में सबसे ज्यादा हैं.

ट्रिपल तलाक : मुस्लिमों में नाराजगी लेकिन महिलाओं की हक की लड़ाई

सरकार को तीसरी बार अध्यादेश लाना पड़ा. कांग्रेस पार्टी सहित विपक्ष के विरोध के चलते सदन में तीन तलाक बिल पास नहीं हो पाया. सायरों बानो जैसी मुस्लिम महिलाओं के लिए भले ही तीन तलाक बिल जिंदगी बदलने वाला हो. परन्तु मुस्लिम संगठन इससे नाराज हैं.

ऐसा नहीं हैं कि बिल के विरोध में केवल मुस्लिम पुरूष ही, ज्यादातर कम पढ़ी लिखी और कट्टर मुस्लिम महिलाएं भी विरोध में हैं. यानी इसका भी असर भाजपा के मुस्लिम वोटबैंक पर पड़ेगा.

भ्रष्टाचार : ‘चौकीदार चोर बनाम मैं भी चौकीदार

बीजपी सरकार ने 2019 के चुनाव में राहुल गांधी के पहले से दिए नारे चौकीदार चोर हैं को ही अपना चुनावी कैम्पेन का हथियार बना लिया. यानी हैशटैग मै भी चौकीदार नारे के साथ देशवासियों को जोड़ने का काम शुरू कर दिया. ट्विटर पर यह ट्रेंड करने लगा. पीएम मोदी खुद ने अपने नाम के आगे ट्वीटर पर चौकीदार लगा लिया. इसी तरह से उनके समर्थक भी सोशल मीडिया पर यह सब कर रहे हैं.
chowkidar pm modi,


खैर, जो भी हो मोदी राज में राफेल एक बड़ा भ्रष्टाचार का मुद्दा बना. अभी भी हैं. लेकिन विपक्ष इसे सही ढंग से पकड़ नहीं पा रहा हैं. इस मुद्दे पर उल्टे सीधे बयान देने से कई बार राहुल गांधी की भी किरकरी हो चुकी हैं. राफेल विवाद पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही हैं. इसी के साथ सीबीआई अफसरों के तबादले वाले बवाल को लेकर भी सरकार पर कई सवालिएं निशान उठते देखें गए.

कुछ भी कहो, जिस तरह से जोरदार तरीके से मोदीजी ने 2014 के चुनावी सभाओं में भ्रष्टाचार को लेकर हुंकार भरी थी. वैसा रूतबा मोदीजी प्रधानमंत्री बनने के बाद जमा नहीं पाए. कहीं न कहीं इसका असर बीजेपी के वोट प्रतिशत पर दिखेगा.

2019 के आम चुनावी समर में कौन बाजी मारेगा तथा उपरोक्त मुद्दों का कितना असर रहेगा, यह तो 23 मई को ही मतगणना में सामने आ पाएगा. लेकिन देशवासियों से अनुरोध हैं कि लोकतंत्र के इस पर्व में जरूर अपनी भागीदारी दिखाए. और एक जिम्मेदार सरकार बनाने में योगदान दें.

✍ अणदाराम बिश्नोई

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