शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

एसएससी परीक्षा : 'युवा हल्लाबोल' की जीत, सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई समिति

• एसएससी मामले में युवा-हल्लाबोल की एक और जीत, परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई एक्सपर्ट समिति
• युवा-हल्लाबोल ने प्रेस कांफ्रेंस कर चेताया था सरकार को, बेरोज़गारी ख़त्म करने का पेश किया था रोडमैप
• 12 जनवरी को युवा हल्लाबोल के छात्र विवेकानंद जयंती पर करेंगे देश के 40 से ज्यादा शहरों में युवा-पंचायत, बेरोजगारी और परीक्षाओं में हो रही धांधली को लेकर बनाए मांगपत्रक को छात्रों से कराएंगे एडाप्ट
• 27 जनवरी को दिल्ली में होगा यूथ समिट, बेरोजगारी दूर करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाएगा युवा-हल्लाबोल


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दिल्ली, 10 जनवरी। एसएससी परीक्षाओं में होने वाली धांधली और भ्रष्टाचार के सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका की आज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की। छात्रों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पेश हुए और सरकार के हठधर्मी रवैये के खिलाफ एक बड़ी जीत हासिल की।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और स्वराज अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया और कहा कि यह समिति भविष्य में होने वाली परीक्षाओं में सुधार संबंधी सुझाव देगी। अदालत ने समिति सदस्यों के तौर पर इंफोसिस के पूर्व चेयरमैन नंदन नीलकेणी और कंप्यूटर वैज्ञानिक विजय भाटकर के नामों की तत्काल घोषणा कर दी, जबकि तीसरे सदस्य के नाम के लिए युवा-हल्लाबोल के याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण से सुझाव मांगा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि एसएससी मामले में जो सीबीआई जांच चल रही है, उसमें क्या प्रगति है, कितने आरोपी पकड़े गए और छानबीन का परिणाम अब तक क्या निकला। वहीं अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि SSC CGL 2017 की परीक्षा को क्यों न रद्द कर दिया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई अब 13 जनवरी को में होगी।

गौरतलब है कि युवा-हल्लाबोल ने दो दिन पहले ही 8 जनवरी को दिल्ली के प्रेस क्लब में एसएससी परीक्षाओं में हो रही गड़बड़ी समेत बेरोजगारी खत्म करने को लेकर प्रेस कांफ्रेंस किया था। प्रेस कांफ्रेंस के अगले दिन 9 जनवरी को युवा-हल्लाबोल के छात्रों-युवाओं ने अपनी मांगों को पूरा करने और राज्यसभा में बैठे सांसदों को अपनी आवाज सुनाने के लिए संसद भवन पर भी प्रदर्शन किया, जिसके बाद पुलिस द्वारा छात्रों की धरपकड़ भी हुई।

युवा-हल्लाबोल का नेतृत्व कर रहे अनुपम ने कहा कि दिल्ली के एसएससी हेडक्वार्टर से छात्रों का जो जोरदार आंदोलन शुरु हुआ, उसके बाद से ही लगातार युवा हल्लाबोल के साथी एसएससी के भ्रष्टाचार के खिलाफ और रोजगार की गारंटी के लिए संघर्षरत हैं। इस लंबी लड़ाई की यह पहली जीत है कि आज सुप्रीम कोर्ट ने समिति बनाने की हमारी मांग मान ली। हमें उम्मीद है कि समिति बनाने से भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के खात्मे और पेपर लीक की मॉडस आपरेंडी पर रोक लग पाएगी।

एसएससी परीक्षा के माध्यम से सीबीआई, रेलवे, विदेश मंत्रालय, जीएसटी, गृह मंत्रालय, डाक विभाग, सीएजी जैसे विभागों में अभ्यर्थियों को नौकरी मिलती है। SSC CGL में तीन चरणों की परीक्षा के बाद अंतिम रूप से चयनित होते हैं। 2017 की परीक्षा जिसपर धांधली का आरोप लगाया गया में इन तीनों चरणों की परीक्षा हो चुकी है।

युवा-हल्लाबोल से जुड़े अमित कुमार के मुताबिक बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हरियाणा में युवा हल्लाबोल की टीम रोज़गार के अवसर और चयन प्रणाली में सुधार को लेकर व्यापक अभियान चला रही है।
दिल्ली टीवी न्यूज़ नेटवर्क

रविवार, 6 जनवरी 2019

#संडे_कवर : कर्जमाफी बना वोटबैंक का हथियार

वोटबैंक भारतीय राजनीति में कोई नया शब्द नहीं हैं। आजादी के बाद कई दशकों से पार्टियां सत्ता हथियाने के लिए कई तरह से जुगाड़ और दांव-पेच लगाती रहीं हैं। जिसमें कभी सफलता मिल जाती हैं, और कभी निराशा भी। उसी में से एक हैं - वोटबैंक। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को तीन राज्यों में सत्ता हाथ लगी। इस जीत के पीछे के कारणों में से किसानों की कर्जमाफी भी एक अहम कारण माना जा रहा हैं।

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वोटबैंक क्या हैं?
वोटबैंक का संबंध समाज के उस वर्ग से हैं, जो किसी कारण वश (राजनैतिक/धार्मिक/जातिगत इत्यादि) राजनीतिक दल को जीताने में योगदान देते हैं। उसे वोटबैंक कहते हैं।
अब कर्जमाफी वोटबैंक का कारण बनती जा रही हैं। राजनीतिक दल किसान वर्ग को कर्जमाफी का लालच देकर वोट हथियाने का जुगाड़ बना रहे हैं।

कर्जमाफी का वादा कर गया काम
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने वादा किया था कि सरकार बनते ही 10 दिन के भीतर किसानों का कर्जमाफ कर दिया जाएगा। जिसके कारण कर्ज से जुझते किसान कांग्रेस के वोटबैंक बन गए। जब चुनावी नतीजें आए, तो पांच राज्यों (मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़,मिजोरम और तेलगांना)  में से तीन राज्यों (राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) में बीजेपी को पटकनी देकर कांग्रेस ने सरकार बनाई। जिससे यह साबित कर दिया कि राहुल गांधी का वादा काम कर गया और कर्जमाफी अब एक वोटबैंक तौर पर भारतीय राजनीति में नया हथियार जुड़ गया।
विधानसभा चुनाव-2018 में मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के दो दिन के भीतर कांग्रेस सरकार ने किसानो का कर्ज माफ किया। इस पर पार्टी अध्यक्ष खुद राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा - "हमने 10 दिन में कर्जमाफी करने का वादा किया था लेकिन इसे दो दिन में कर दिखाया।"

कांग्रेस को देख, बीजेपी शासित राज्यों ने भी की कर्जमाफी
कांग्रेस शासित तीन राज्यों में कर्जमाफी के बाद आगामी चुनाव को मद्देनजर बीजेपी शासित राज्यों ने भी कांग्रेस की राह पर चलना शुरू कर दिया। क्योकि बाद में बीजेपी शासित राज्य गुजरात में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के नेतृत्व में किसानों का 625 करोड़ का कर्ज माफ किया गया। वहीं असम में 25 फीसदी किसानों का कर्ज माफ किया गया। जहां पर बीजेपी की सरकार हैं।
आपको बता यह भी दे कि उत्तरप्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित़्यनाथ ने करीब 30,729 करोड़ का कर्ज माफ किया था। वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा कर्ज से जुझते 35 लाख किसानों की कर्जमाफी की गई, जहां पर बीजेपी की सरकार हैं। अभी चर्चा यह भी हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए मोदी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को राहत देने की तैयारी में हैं, जिसका जल्द ही ऐलान होने वाला हैं।

जनहित मुद्दा यह हैं कि कर्जमाफी कोई स्थाई समाधान नहीं हैं। सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए राजनीतिक दल कर्जमाफी को वोटबैंक के रूप में हथियार बना रहे हैं। जिसमें किसानों का हित बहुत कम, राजनीतिक दलों का हित कहीं ज्यादा नजर आ रहा हैं। कर्जमाफी से राज-कोष पर वित्तिय बोझ बढ़ता हैं। इससे अच्छा हैं कि सरकार स्थाई समाधान ढुढ़ें।
✍ अणदाराम बिश्नोई

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

सीसैट पीड़ित UPSC छात्र पांच दिन से भूख-हड़ताल पर, लेकिन सरकार कर रही अनदेखा

• युवा-हल्लाबोल द्वारा समर्थित यूपीएससी छात्र कर रहे हैं क्षतिपूरक प्रयास की मांग
• ढाई सौ से ज़्यादा सांसदों के समर्थन पत्र के बावजूद छात्रों की सुनवाई न होना सरकार के युवा विरोधी चरित्र को दर्शाता है: अनुपम
• एसएससी से लेकर यूपीएससी तक छात्रों के हर प्रदर्शन के प्रति मोदी सरकार ने दिखाया है संवेदनहीन और अलोकतांत्रिक रवैय्या: युवा-हल्लाबोल


दिल्ली | यूपीएससी परीक्षाओं में क्षतिपूरक प्रयास की मांग को लेकर दिल्ली के मुखर्जीनगर में युवा-हल्लाबोल समर्थित सीसैट पीड़ित छात्रों का प्रदर्शन आज पाँचवे दिन भी जारी रहा। मांगों को लेकर पाँच छात्रों के भूख-हड़ताल पर बैठे होने के बावजूद अब तक सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक संवाद स्थापित नहीं किया गया है।

युवा-हल्लाबोल आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अनुपम ने बताया कि वर्ष 2011 में संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में सीसैट प्रणाली की शुरुआत की थी, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के प्रति भेदकारी था। बाद में निगवेकर कमिटी की रिपोर्ट ने पुष्टि किया कि सीसैट परीक्षा प्रणाली भारतीय भाषाओं के छात्र और ग़ैर-इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के ख़िलाफ़ था। इसी अन्याय के ख़िलाफ़ छात्रों की मांग रही है कि सीसैट के कारण जिन अभ्यर्थियों के बहुमूल्य वर्ष बर्बाद हुई उन्हें दो क्षतिपूरक प्रयास दिए जाएं।

प्रदर्शन कर रहे यूपीएससी अभ्यर्थी अंशु चतुर्वेदी ने बताया कि सीसैट के कारण हुए अन्याय के ख़िलाफ़ पाँच छात्र अनशन पर बैठे हुए हैं और हम अपना प्रदर्शन तब तक जारी रखेंगे जब तक कि सरकार हमारी मांग मान नहीं लेती। बड़े अफ़सोस की बात है कि मांग मानना तो दूर सरकार की तरफ़ से अब तक कोई भी हमारी सुध लेने भी नहीं आया है।

राज्य सभा में एनसीपी सांसद द्वारा यूपीएससी छात्रों का सवाल उठाया गया लेकिन सरकार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आया। राज्य सभा सांसद श्री संजय सिंह ने भी मुखर्जीनगर पहुँचकर पुलिसिया कार्यवाई पर सवाल उठाते हुए छात्रों की मांग का समर्थन किया।
UPSC Aspirant •1 विशाल, हरियाणा. 2 मनीष, बिहार. 3. शिखा, उत्तरप्रदेश
अनुपम ने सवाल किया कि जब यह पूर्णतः स्पष्ट हो चुका है कि सीसैट परीक्षा प्रणाली भेदकारी थी, तो इस विफल सरकारी प्रयोग से पीड़ित छात्रों को क्षतिपूरक प्रयास क्यूँ नहीं दिया जा रहा? हैरत की बात है कि ढाई सौ से भी ज़्यादा सांसदों द्वारा समर्थन पत्र के बावजूद मोदी सरकार छात्रों की मांग नहीं मान रही है। लेकिन मांग मानना तो दूर उल्टे प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ पुलिस द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।

एसएससी के छात्र जब सीजीओ कॉम्प्लेक्स में सड़कों पर बैठे थे तो पुलिस ने चादर, कंबल हटाने से लेकर शौचालय और पानी तक बंद कर दिया था। अब जब यूपीएससी अभ्यर्थी मुखर्जीनगर में बैठे तो इस कड़ाके की ठंढ में भी आग बुझाना, प्रदर्शनस्थल पर पानी फेंकना, ज़ोर ज़बरदस्ती और बार बार डिटेन करने जैसी कार्यवाई पुलिस कर रही है। यह मोदी सरकार की संवेदनहीनता ही नहीं, युवा-विरोध चरित्र को भी दर्शाता है।

अनुपम ने कहा कि सीसैट पीड़ित अभ्यर्थियों के साथ अगर न्याय नहीं किया गया तो यूपीएससी छात्र ही नहीं, देशभर के युवा एकजुट होकर सरकारी नीतियों पर हल्लाबोल करेंगे।

बुधवार, 2 जनवरी 2019

सिनेमा से सियासी जंग, लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस बनाएगी पीएम मोदी पर फिल्म

पूर्व प्रधानमंत्री (पीएम) डॉ. मनमोहन सिंह पर बनी, अनुपम खेर की फिल्म 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' 11 जनवरी को रिलीज होगी। भारत के इतिहास में यह पहली सियासी फिल्म हैं, जो राजनेता पर बनी हैं। लेकिन अब लग रहा है कि सिनेमा से सियासी जंग का युग शुरू होने जा रहा हैं। क्योकि कांग्रेस खेम्में से मोदी पर फिल्म बनाने के लिए मंथन चलने की खबर आ रही हैं।

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Poster of  'The Accidental Prime Minister' 

पंजाब में 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर बैन का कयास थम गया हैं। साथ ही अमृतसर पश्चिम से कांग्रेस विधायक राजकुमार वेरका ने प्रधानमंत्री पर फिल्म बनाने की बात कही है।  वहीं चर्चा यह भी चल रही है कि मुबंई कांग्रेस इकाई के दिग्गज नेता फिल्म-निर्माताओं के सम्पर्क में हैं। जल्द ही लोकसभा चुनाव के ऐन मौकें पर मोदी पर वार करने के लिए फिल्म रिलीज कर दी जाएगी। हांलाकि फिल्म के नाम को लेकर कई कयास लगाएं जा रहे हैं। कांग्रेसी समर्थक सोशल मीडिया पर मोदी पर तंज कसते हुए कई तरह नाम सुझाकर, सिनेमा-सियासी मुद्दें को हवा देने की कोशिश करते दिख रहे हैं। 'चौकीदार चोर' से लेकर 'झूठ का बादशाह' तक कई नाम कांग्रेसियों में चर्चा की विषय बना हुआ हैं। लेकिन 'जुमलेबाज' नाम सबसे टॉप पर चल हैं, जो सबसे ज्यादा सुझाया  जा रहा हैं।

यह हैं विवाद
'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' फिल्म संजय बारू कि किताब पर आधारित हैं। संजय बारू यूपीए की सरकार के समय पीएम डॉ. मनमोहन के मीडिया सलाहाकार रहे थे। इस फिल्म के ट्रेलर से ही साफ तौर से झलक रहा हैं कि यूपीए सरकार अंदर क्या चल रहा था और पीएम के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह क्या करना चाहते थे और किस तरीके पीएम की भूमिका निभा रहे थे; यह सब इस फिल्म में दिखाया गया हैं। स्वभाविक हैं कौनसी ऐसी पार्टी होगी ,जो अपने कार्यकाल की अंदर बात को पब्लिक डोमेन में आने देगीं। इसलिए  कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा शुरूआत में विरोध के सुर सुनाई दिए। कई कांग्रेसी नेताओं ने विरोधी बयान दिए और कहा- लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह फिल्म बीजेपी का प्रोपैगेंडा हैं।
वहीं बीजेपी नेताओं/प्रवक्ताओं नें इन बातों को नकार दिया। फिलहाल मोदी पर फिल्म बनाने की बात को हवा देकर कांग्रेसियों का विरोध शांत पड़ता नजर आ रहा हैं।

जनहित मुद्दा यह है कि आखिर सियासत समय के साथ किस तरह बदल रही हैं। शायद ही किसी ने सोचा होगा ! हिन्दू-मुस्लिम, सांप्रदायिकता, फेंक न्यूज/सोशल-मीडिया से सिनेमा तक पहुंच जायेगी। जनता को इस नब्ज को बड़े ही ध्यान से पकड़ते हुए इन तमाम चीजों को समझना होगा, कि कौन कितना ठीक हैं तथा कौन कितना गलत। दुसरा पहलू यह भी हैं, पहले तो सिर्फ मीडिया और लेखकों पर ही राजनीति झुकाव का धब्बा लगता रहा हैं। लेकिन अब सिनेमा-जगत के हीरो-हीरोइन, निर्देशक-निर्माता भी इसमें शामिल हो जाएगें।
फिलहाल अब आगे यह देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा कि मोदी पर फिल्म बनाकर किस तरह पलटवार करती हैं।
✍ अणदाराम बिश्नोई

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

फोटो स्टोरी : इस चुनावी मौसम में वोट खातिर नेताजी क्या-क्या कर रहे हैं ! जाने इस रिपोर्ट में

विधानसभा चुनाव के मतदान तीन राज्यों (मिजोरम, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) में पूर्ण होने के बाद 7 दिसम्बर को राजस्थान और तेलगांना में होेने बाकी हैं।  जैसे-जैसे मतदान तारीख नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे सारे दल, बागी, और निर्दलीय जीतने के लिए धुआंधार प्रचार कर रहे हैं। लेकिन इन पांच राज्यों के चुनावी मौसम में नेताओं के प्रचार के दौरान कई अनोखें, अजीबो-गरीब तरीके देखने को मिले हैं। कहीं कोई प्रत्याशी जूता देकर बोले - वादा पूरा न करूं तो इसी से पीटना , तो कहीं घेरेलू कामों में महिलाओं के साथ हाथ बंटाए। पढ़िए दैनिक भास्कर के 'चुनाव विशेष' पेज की सहायता से तैयार की गई अणदाराम बिश्नोई की विशेष रिपोर्ट - 

Chunav Special, Election 2018,

जीत का टोटका
तेलगांना के  CM ने करवाया यज्ञ, तो इधर राजस्थान के पूर्व CM को बहन ने दिया शगुन
फोटो साभार : दैनिक भास्कर
हैदराबाद (तेलगांना) | राज्य के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव  (केसीआर) ने सत्ता वापसी के लिए दो दिन का 75 पंडितो से यज्ञ करवाया। जिसमें केसीआर की पत्नी सहित पुरा कैबिनेट भी शामिल हुआ। फिर चुनाव प्रचार की शुरूआत की गई। यह तस्वीर टीआरएस प्रमुख केसीआर के यज्ञ की हैं, जो हाल ही के दिनों में हुआ।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
जोधपुर (राजस्थान) | तो इधर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  सरदारपुरा विधानसभा सीट से नामांकन भरने से पहले बड़ी बहन विमला से आशीर्वाद लेने गए। बहन ने जीत का आशीर्वाद देकर चुनाव लड़ने के लिए 500 रूपए का शगुन भी दिया।

गृह-कामों में बंटा हाथ
किसी ने बर्तन मांजे तो किसी ने देहरी लिपी, महिलाओं ने मना किया लेकिन नेताजी नहीं रूकें
Photo Credit- Dainik Bhaskar
इंदौर (मप्र) | यह फोटो संदीप जैन ने ली हैं। जो भास्कर में 19 नवम्बर को प्रकाशित हुई थी। जिसमें साफ दिख रहा हैं कि एक महिला बर्तन मांज रही हैं और पास ही एक टोकरी में पड़े कुछ बर्तनों मे से भगोने को लाल चोला व माला पहना हुआ व्यक्ति भी मांज रहा हैं। ध्यान रहे यह कोई आम व्यक्ति नहीं बल्कि  इंदौर की सांवेर सीट  से भाजपा प्रत्याशी  राजेश सोनकर हैं। जो शनिवार को वोट मांगने घरों में निकले थे। इसी बीच प्रत्याशी सामान्यत: एक घर में वोट मांगने गए, जहां पर पहले से ही महिला रसोई में बर्तन मांज रही थी। यह देखकर नेताजी ( भाजपा प्रत्याशी)  भी बर्तन मांजने बैंठ गए और वोट की अपील करने लगें। महिला ने बर्तन मांजने से मना भी किया लेकिन नेताजी चुनावी मौसम को भांपते हुए नहीं रूकें।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
डबरा(मप्र) | दुसरी तस्वीर  डबरा मध्यप्रदेश की हैं। जिसमें भाजपा के बागी तथा वर्तमान में शिवसेना के प्रत्याशी  दिनेश खटीक महिला के साथ देहरी लिपते दिख रहे हैं। तस्वीर को ध्यान से देखें तो पता चलता हैं कि गले में माला डाले हुए नेताजी देहरी के नीचे खड़े हैं और एक हाथ से पानी का छींटा भी मार रहे हैं।  वहीं नेताजी का दुसरा हाथ देहरी पर टीका हैं। देहरी पर सफेदी से रंगोली की तरह कुछ बना हुआ दिख रहा हैं। जिसके दुसरी तरफ महिला खड़ी हैं। भास्कर में प्रकाशित खबर के अनुसार महिला ने नेताजी को देहरी लिपने से मना भी किया। परन्तू नहीं माने और कहने लगें - मुझे नोट दीजिए तो ऐसे ही घर के सारे काम करूगां।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
लाडपुरा | यह तस्वीर आम गृहणी की नहीं बल्कि भाजपा प्रत्याशी (लाडपुरा) और पूर्व युवरानी कल्पना देवी की हैं। वाक्या उस वक्त का हैं, जब कल्पना घर-घर जाकर जनसम्पर्क कर रही थी। युवती को चूल्हे पर रोटी बनाते देख, कल्पना ने हाथ बंटाया और खुद रोटियां सेकनें लगी। साथ ही वोट की अपील भी की।

फार्मिंग और टेलरिंग भी
नेताओं के रूप अनेक : कहीं दर्जी तो कहीं किसान
Photo Credit- Dainik Bhaskar
महबूबाद (तेलगांना) | यह तस्वीर एक दर्जी के घर की हैं। सिलाई मशीन को चला रहे दर्जी नहीं बल्कि तेलगांना की मेहबूबाद विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी जाटोत हुसैन नायक हैं। प्रचार पर निकले नायक, दर्जी का वोट लेने के लिए सिलाई करने लगें। हाल ही में भास्कर में प्रकाशित हुई खबर के अनुसार  नायक किसान का हल चलाने, नाई की दुकान पर लोगों की दाढ़ी तक बना रहे हैं।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
चोपदंडी (तेलगांना) | यह तस्वीर भी तेलगांना राज्य से हैं, जिसमें साफ दिख रहा है कि तीन व्यक्ति एक ही रंग का (लाल) गमच्छा पहने , किसान के पास बैठें हैं। इन में से बीच में हैं, सफेद पेन्ट-शर्ट व लाल गमच्छे में टीआरएस प्रत्याशी सुके रविशंकर। जो वोट खातिर किसान के घर पर भुट्टे छिल रहे हैं। हाल हीं में भास्कर में प्रकाशित खबर के मुताबिक  वोट मांगने के दौरान रविशंकर घरों मेंं कपड़े प्रेस करना, मजदुरों के साथ ईंट उठाई और  या तक की बैंड-बाजा वालों के साथ पुंगी व ढोल भी बजाते हैं।

पैर पड़ना
राहगीर के पैर तब तक नहीं छोड़ते, जब तक वोट का आश्वासन नहीं मिलता
Photo Credit- Dainik Bhaskar
गुना (मप्र) | यह तस्वीर अमित शर्मा ने ली है, जो मध्यप्रदेश के गुना की हैं। तस्वीर में सपाक्स दल के प्रत्याशी जगदीश खटीक जीत के लिए हर राहगीर का पैर पकड़ते नजर आ रहे हैं। तब तक नहीं छोड़ते जबतक जीत का आशीर्वाद नहीं देते।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
दौसा (राज.) | तस्वीर में सफेद चटाई पर एक व्यक्ति दंडवत नजर आ रहा हैं। जो भगवान के आगे नहीं बल्कि भरे बाजार में बीच रोड़ पर जनता के आगें हैं। इससे दुसरा पहलू यह भी झलकता हैं कि जो नेता पांच साल में कभी जनता की सुध तक लेने नहीं आए और अब किस तरह के ड्रामें कर रहे हैं। आपको बता दे कि दंडवत हुए यह शख्स भाजपा प्रत्याशी ओम प्रकाश हूडला हैं। जो लोगों से इस तरीके वोट मांग रहे हैं।

जलवा निर्दलीयों का...
कोई पीटने के लिए चप्पल दे रहा है तो किसी ने जमीन गिरवी रखी
Photo Credit- Dainik Bhaskar
कोरातला (तेलगांना) | यह तस्वीर तेलगांना के कोरातला क्षेत्र की हैं। जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार अकला हनुमंत वोटरों को चप्पल दे रहे हैं और कह रहे हैं कि जीतने के बाद वादें पुरें नहीं किए तो इसी चप्पल से पीटना।

जोधपुर (राज.) | वहीं दुसरी तस्वीर राजस्थान के औसियां विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार विशेक विश्नोई के 16 वादों की हैं। जिसमें आप साफ तौर पर देख सकते हैं कि वादें पुरा न करने पर अपनी 16 बीघा जमीन जनता को सुपुर्द करने की बात कहीं गई हैं। इसके अलावा विश्नोई अपने प्रचार के तौर-तरीको को लेकर भी काफी सुर्खियों में हैं। कभी ऊंट गाड़ी पर प्रचार करते हैं तो कभी चुनाव चिह्न खटिया (चारपाई) को साथ में लेकर।

प्रचार का अंदाज अनोखा
प्रत्याशी कहीं कच्ची घोड़ी के साथ, तो कही खाट पर बैठकर कर रहे प्रचार
Photo Credit- Dainik Bhaskar
बगरू (राज.) | जयपुर की बगरू सीट से चुनाव लड़ रहे हैं भाजपा प्रत्याशी कैलाश वर्मा मतदाताओं को लुभाने की अलग-अलग तरकीब अपना रहे हैं। इस तस्वीर में रंगीला साफा बांधे वर्मा कच्ची घोड़ी के साथ प्रचार करते नजर आ रहे हैं।

Photo Credit- Dainik Bhaskar
कोटड़ा (राज.) | इस तस्वीर को शाहिद खान पठान  ने  राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्र झाड़ेल विधानसभा के छालीबोकड़ा ग्रामीण एरिया से ली हैं। जिसमें नेताजी  को कुछ समर्थक  खाट (चारपाई)  पर बैंठाकर रोड़ शो कर रहे हैं। आपको बता दे कि खाट पर विराजमान दिख रहे नेताजी  सोहनलाल परमार निर्दलीय प्रत्याशी हैं।

तो देखा आपने ! इस चुनावी मौसम में सत्ता को पाने के लिए किस तरह के तरीके अपनाए जा रहे हैं। कॉमेंट करके बताइए , आपको यह आलेख कैसा लगा ? और इसे शेयर करना बिल्कुल मत भूलिए।
✍ अणदाराम बिश्नोई


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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

नजरिया- एक युवा सोच : युवाओं की सोच बदलने वाली अंकित कुंवर की पुस्तक का रिव्यू

"नजरिया- एक युवा सोच" जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि लेखक के मन में क्या है? पुस्तक के बारे में कुछ कहने से पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि भविष्य युवाओं का ही है। जिस देश में युवा ताकतवर होंगे, वह देश ताकतवर होगा। आज राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो प्राय: सभी राजनीति दल भी इसी राह पर चल रहे हैं और युवाओं का आगे कर रहे हैं। हमारे देश में भी युवाओं की अच्छी खासी आबादी है। युवाओं में असीम ऊर्जा होती है। वह कुछ भी कर गुजरने में सक्षम होते हैं। जिसने भी युवाओं को पहचान लिया, समझो उसने भविष्य पहचान लिया। इसके बावजूद आज युवाओं के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। सरकार की नीतियां भी युवाओं का केन्द्र में रखकर बनती हैं। युवा पीढ़ी ताकतवर रहेगी तो हम ताकतवर रहेंगे। युवा शिक्षित होंगे तो देश शिक्षित होगा। युवाओं के कंधे पर ही सब कुछ टिका है। 

Najariya ek yuva soch book review, ankit kunwar book


लेखक अंकित कुंवर स्वयं एक युवा हैं और जाहिर है कि उन्होंने इस सोच को जागरूक करने के लिए अपने लेखों का ताना-बाना बुना है। चार खंडों में विभक्त इस संग्रह में लेखक ने अपने लेखों को शामिल किया है। इन लेखों में समाज में फैली विसंगतियों को जहां रेखांकित किया गया है, वहीं एक राह दिखाने का भी प्रयास किया गया है। 

पहला खंड : समसामयिक विषय
पहले खंड में विश्व में हिंदी की दशा और दिशा में यह प्रयास किया गया है कि युवा वर्ग को बताया जाए कि हिंदी अब ऐसी भाषा नहीं रही कि किसी देश में उसे गंभीरता से न लिया जाए। अब हिंदी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी खंड में जहां सप्तक के सिद्ध कवि के बारे में युवा पीढ़ी को बताने का प्रयास किया गया है, वहीं जम्मू-कश्मीर की अनूठी संस्कृति को भी रेखांकित किया गया है। भारत की विदेश नीति में भारत-इजरायल के संबंधों का उल्लेख करते हुए यह अवगत कराने का प्रयास लेखक ने किया है कि युवा पीढ़ी को अपने देश की विदेश नीति से भी अवगत रहना चाहिए।

दूसरा खंड : राजनीतिक परिदृश्य
दूसरे खंड में राजनीति में हो रहे बदलाव, संविधान के अनुच्छेद ३५-ए, कामयाबी के शिखर पर मोदी लहर, दलित समुदाय और संसद की गरिमा को रेखांकित करते हुए यह बताने का प्रयास किया गया है कि युवा पीढ़ी को अपने देश के बारे में जानकारी रखनी ही चाहिए। 

तीसरा खंड : मुद्दों पर आधारित 
तीसरे खंड में देश के सामने खड़े मुद्दों को रेखांकित किया गया है। देश के सामने बहुत सारे मुद्दे हैं। इसमें भ्रष्टाचार, भुखमरी, जलवायु, सृष्टि के लिए आवश्यक लैंगिक असमानता की बढ़ती खाई, जल संरक्षण ओर किसानों की समस्याओं को रेखांकित किया गया है।

चौथा खंड : व्यंग्यात्मक निबंध 
चौथे खंड में अपने व्यंग्य लेखों के माध्यम से संग्रह में गंभीरता को हल्का करने का प्रयास किया गया और सामाजिक मुद्दों को हलके-फुलके ढंग से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया हैॅ।

कौन हैं अंकित कुंवर
लेखक अंकित कुंवर पिछले काफी वक्त से देश के विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। उनका नाम नया नहीं है लेकिन उनका प्रयास नया है और माना जा सकता है कि नई पीढ़ी इस संग्रह में कुछ नया पाएगी। 

पूर्व राष्ट्रपति द्वारा पुस्तक का लोकार्पण 
गौरतलब है अंकित कुंवर द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन शुक्रवार को भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी द्वारा किया गया। पुस्तक विमोचन के अवसर पर माननीय प्रणब मुखर्जी ने उन्हें मुद्दों पर आधारित पुस्तक लेखन हेतु शुभकामनाएं दीं एवं लेखन को निरंतर जारी रखने के लिए प्रेरणा दी। इस पुस्तक विमोचन से पहले युवा लेखक अंकित कुंवर अपनी पुस्तक 'नज़रिया एक युवा सोच' की पहली प्रति श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भेंट कर चुके हैं।  
आप इस पुस्तक के ऐमज़ॉन से ऑनलाइन खरीद सकते हो।

(लेखक अपनी नई पुस्तक को रिव्यू के लिए DelhiTV.in को भेज सकते हैं।  इसके लिए DelhiTV.in कोई शुल्क नहीं लेता हैं। ज्यादा जानकारी के लिए मेल - jambhsnehi@gmail.com)

बुधवार, 21 नवंबर 2018

झालरापाटन - वसुंधरा राजे या मानवेंद्र जसोल, कौन जीतेगा ? पढ़िए सटीक विश्लेषण

झालरापाटन सीट वैसे तो वसुंधरा राजे के गढ़ के तौर पर देखी जाती है ...यहां मैं इस सीट को बीजेपी का गढ़ नहीं कह रहा हूं, ये ध्यान देने लायक है ...वहीं इस सीट पर मानवेंद्र सिंह के उतरने से क्या वसुंधरा राजे का तिलिस्म टूट जाएगा या फिर मानवेंद्र का स्वाभीमान धराशाही हो जाएगा ...इसको समझने के लिए पहले आपको यहां के जातिगत समीकरण समझने होंगे 

झालरापाटन से वसुन्धरा के सामने मानवेन्द्र सिंह

जातिगत समीकरण :
इस सीट पर करीब 40,000 मुस्लिम मतदाता, 28000 दांगी, 20000 राजपूत, 21000 ब्राह्मण, 13000 धाकड़, 21500 गुर्जर और करीब 19000 राठौर तेली मतदाता हैं.......

अब आपको वो मुद्दे बताते हैं जो वसुंधरा या मानवेंद्र किसी को भी जिता सकते हैं या फिर हरा सकते हैं ...

वसुंधरा राजे के पक्ष व विरोध में
पक्ष में :
1. वर्तमान मुख्यमंत्री होना उनके पक्ष में है
2. 3 बार पहले भी जीत चुकी हैं, जातिगत समीकरणों को अपने और पुत्रवधु के रिश्तों के साथ साधती हैं
3. झालरापाटन में कार्यकर्ताओं पर अच्छी पकड़ है
4. झालरापाटन के विकास में अच्छी भूमिका निभाई है
5. जाट, राजपूत और गुर्जर जाति को रिश्तों के जरिए साधती हैं

विरोध में :
1. एंटी इंक्बेंसी वसुंधरा के खिलाफ जा सकती है
2. फिल्म पद्मावत और आनंदपाल प्रकरण के बाद राजपूत बीजेपी से नाराज हैं
3. 2 अप्रैल का दलित आंदोलन बीजेपी के खिलाफ काम करेगा
4. सचिन पायलट का गुर्जर होना और मानवेंद्र का राजपूत होना ..गुर्जर और राजपूत वोटों को प्रभावित करेगा
5. मुस्लिम वोट बीजेपी से इतर कांग्रेस के साथ जा सकता है
6. झालरापाटन में दलित, राजपूत, मुस्लिम और दांगी मिलकर वसुंधरा को हरा सकते हैं

मानवेंद्र के पक्ष-विरोध में क्या है ?
पक्ष में :
1. मानवेंद्र स्वाभीमान के नाम पर राजपूत वोट हासिल कर सकते हैं
2. मानवेंद्र कांग्रेस की वजह से मुस्लिम वोट हासिल कर सकते हैं
3. दलितों की बीजेपी से नाराजगी मानवेंद्र के पक्ष में दिख सकती है
4. मानवेंद्र का इतिहास वसुंधरा राजे पर भारी पड़ सकता है
5. सचिन पायलट अगर झालरापाटन में प्रचार करने पहुंचे तो गुर्जर वोटों को वसुंधरा से छिना जा सकता है
6. गुर्जर, राजपूत, दांगी और मुसलमान और दलित मानवेंद्र को आसानी से जिता देंगे

विरोध में :
1. मुख्यमंत्री के खिलाफ मैदान में आना ही मानवेंद्र के विरोध में है
2. बाडमेर से आकर झालरापाटन में चुनाव लड़ना मानवेंद्र को कमजोर बनाता है
3. झालरापाटन में कांग्रेस के संगठन का कमजोर होना भी मानवेंद्र के खिलाफ है
4. जनता के साथ जुड़ना मानवेंद्र के लिए बड़ी चुनौती होगी
5. मानवेंद्र का नाम मुख्यमंत्री की रेस से बाहर होना भी मानवेंद्र को साधारण बनाता है

निष्कर्ष - वसुंधरा अगर हारती है तो हार के पीछे राजपूत और दलित आक्रोश और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होगा और अगर मानवेंद्र हारते हैं तो इसके पीछे उनका झालरापाटन से जुड़ाव ना होना होगा ...लेकिन ये तय है कि मुकाबला आसान नहीं रहेगा .....

विजेन्द्र सोलकी, 1st india news Rajasthan News anchor and Sub-editor
✍ सीनियर न्यू़ज एंकर एवं फर्स्ट इंडिया न्यूज राजस्थान के सब-एडिटर विजेन्द्र सोलंकी जी की एफबी वॉल से अनुमति के तहत

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टोंक में सचिन जीतेगा या युनूस - जरूर पढ़ें

राजस्थान की सबसे हॉट सीट बनी हुई है टोंक ...लेकिन इस सीट पर सचिन पायलट जीतेंगे या फिर युनूस खान ..इसको समझने के लिए मैं आपके सामने कुछ आंकड़े रखता हूं ...जरा समझने की कोशिश कीजिए किसके क्या खिलाफ जाएगा, क्या पक्ष में जाएगा 

सचिन v/s यूनूस खान, टोंक में सचिन जीतेगा या यूनस खान

सचिन पायलट के पक्ष में
1. जनता में संदेश कि उनके वहां से अगला मुख्यमंत्री होगा
2. अल्पसंख्यक और गुर्जर मतदाताओं के समर्थन की उम्मीद
3. 2 अप्रैल के बाद दलितों के विरोध का फायदा कांग्रेस उठाने की कोशिश करेगी
इनको मिलाया जाए तो आसानी से बहुतम का आंकड़ा सचिन पायलट को मिल जाएगा

सचिन पायलट के खिलाफ
1. सचिन पायलट टोंक से नहीं है, ये उनके खिलाफ जाएगा
2. युनूस खान के खड़े होने की वजह से मुस्लिम मतदाताओं का साथ नहीं मिलेगा
3. बीजेपी मुस्लिम नेताओं को संदेश देगी कि राजस्थान में सिर्फ एक मुस्लिम प्रत्याशी को उतारा है अगर वो भी हारा तो आगे टिकट नहीं दिया जाएगा
4. अशोक गहलोत का ये कहना कि प्रदेश में एक नहीं बल्कि 5-6 मुख्यमंत्री दावेदार हैं, सचिन के मुख्यमंत्री के दावे को कमजोर कर रहा है

युनूस खान के पक्ष में
1. युनूस खान का मुस्लिम चेहरा होना ही उनका सबसे मजबूत पक्ष है
2. 65 हजार से ज्यादा मुस्लिम मतदाता होना युनूस खान को मजबूत बनाता है
3. कांग्रेस में फूट के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जाएगा
4. पूरी सरकार यहां सचिन के खिलाफ नजर आ सकती है

युनूस खान के विरोध में
1. अजित मेहता के टिकट कटने से भीतरघात का खतरा रहेगा
2. युनूस खान के विपरीत कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद का दावेदार होना युनूस के पक्ष को कमजोर करता है
3. दलित वोट बैंक की नाराजगी युनूस खान पर भारी पड़ सकती है, जिनकी तादात 40 हजार से ज्यादा है
4. बीजेपी की 5 सालों में टोंक में नाकामी का खामियाजा युनूस खान को उठाना पड़ेगा

निष्कर्ष - सचिन पायलट अगर हारते हैं तो इसके पीछे कांग्रेस का ही हाथ होगा और अगर युनूस खान हारते हैं तो उसके पीछे मुस्लिम मतदाताओं और दलितों की बीजेपी से नाराजगी

सीनियर न्यू़ज एंकर एवं फर्स्ट इंडिया न्यूज राजस्थान के सब-एडिटर विजेन्द्र सोलंकी जी की एफबी वॉल से अनुमति के तहत



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गुरुवार, 15 नवंबर 2018

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

साहेब ! जुमला नहीं, जॉब चाहिए : युवा-हल्लाबोल

2014 में मोदीजी ने हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। लेकिन हाल ही में दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल की तुलना इस साल बेरोजगारी दर  बढ़ी हैं। तो वहीं हैरानी की बात यह है साढ़े चार साल में कितनी नौकरियां दी इसके सरकार के पास अधिकारिक आंकड़े भी नहीं हैं। दुसरा, जहां नौकरियां हैं वहां पर देने के बजाय उसे लटकाया जा रहा हैं। जिसके कारण युवाओं में रोष व्याप्त हैं। इसी कड़ी में युवाहल्ला टीम ने देशभर में नौकरियां की समस्याओं को लेकर आंदोलन करने का मन बनाया हैं। जिसके चलते टीम, युवाओं के बीच जाकर पंचायत का आयोजन कर रही हैं 

Yuva hallabol yuva panchayat
नई दिल्ली | सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार और अवसरों की कमी के सवाल पर युवा-हल्लाबोल ने देश के कई हिस्सों में युवाओं की पंचायत का आयोजन किया। पंचायत में युवा प्रतिनिधियों ने बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन चलाने की रूपरेखा बनाई और अपने अपने शहरों में युवा-हल्लाबोल के आयोजन का निर्णय भी लिया। 

ज्ञात हो कि युवा-हल्लाबोल सरकारी नौकरी में अवसरों की कमी और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रहा राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। एसएससी घपले के ख़िलाफ़ भी युवा-हल्लाबोल ने देशभर में प्रदर्शन और दिल्ली के संसद मार्ग पर रैली का आयोजन किया था। जाने माने वक़ील श्री प्रशांत भूषण अब एसएससी का मामला उच्चतम न्यायालय में लड़ रहे हैं। रोज़गार की आस लगाए छात्रों के लिए युवा-हल्लाबोल देश के आक्रोशित और आंदोलित युवाओं की असरदार आवाज़ है।

युवा-हल्लाबोल का नेतृत्व कर रहे अनुपम ने कहा कि युवा-हल्लाबोल के द्वारा आज कई शहरों में पंचायत का आयोजन किया गया है जिसमें आंदोलन की रूपरेखा पर चर्चा हुई। कोलकाता, पटना, जयपुर, भोपाल, इलाहाबाद, रेवाड़ी, बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे समेत देश के कई शहरों में बैठकें हुई हैं। यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहा छात्र अब सिस्टम की नाकामी के सामने मौन नहीं रहेगा और इस संघर्ष को सार्थक अंजाम तक पहुंचाएगा। तरह तरह की भर्ती परीक्षाओं में हुए धांधली के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे छात्र अब युवा-हल्लाबोल के माध्यम से अपनी मांगों को और मजबूती से उठा रहे हैं।

युवा-पंचायत में हुए संवाद से यह स्पष्ट हो गया कि छात्रों में सरकार की उदासीनता को लेकर भारी रोष है। अपने भविष्य को लेकर युवा अनिश्चित हैं और अंधकार में हैं। चिंता जाहिर की गई कि अगर युवा ही असुरक्षित हों तो देश का भविष्य भला कैसे सुरक्षित हो सकता है।

4 लाख नौकरियां की खत्म
सरकारी नौकरियों में आज 24 लाख से ज़्यादा पद रिक्त हैं। लेकिन इन्हें भरने की बजाए केंद्र सरकार ने 4 लाख पदों को ख़त्म कर दिया। एक तरफ जहाँ दिन ब दिन देश की आबादी बढ़ रही है, सरकार नौकरियों की संख्या कम करते जा रही है। जो थोड़ी बहुत नौकरियां हैं भी तो वो किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार या धांधली का शिकार हो जा रहे हैं। पढ़े लिखे छात्र इस भ्रष्ट तंत्र में पिसते जा रहे हैं। आये दिन कोई न कोई पेपर लीक या नौकरी बेचने वाले गिरोहों की ख़बर मिलती है। ऐसे में शिक्षित युवाओं का देश की परीक्षा प्रणाली से भरोसा उठता जा रहा है। सरकारी नौकरी के लिए आज मेहनत या मेरिट की जगह पैसा या पैरवी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे वक़्त में जब हमारी चुनी हुई सरकारों को युवाओं की पीड़ा समझकर इसका समाधान करना चाहिए था तो सरकार मानने को भी तैयार नहीं कि बेरोज़गारी एक समस्या है। युवा पंचायत ने एक सुर में सरकार को कहा है कि देश के युवाओं को जॉब चाहिए, जुमला नहीं। 

Yuva halla bol yuva panchayat


अनुपम ने कहा कि युवा-हल्लाबोल के माध्यम से देशभर के युवा अब बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ सामूहिक संघर्ष के लिए एकजुट हो रहे हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि देश की दशा दिशा तय करने वाले युवाओं को अपना भविष्य ही आज अंधकारमय दिख रहा है। जिनके समर्थन से यह सरकार बनी, जिनको सालाना दो करोड़ नौकरी का वादा करके ये सत्ता में आए, आज उन्हीं युवाओं के साथ सरकार ने छल किया है।
✍ दिल्लीटीवी न्यूज नेटवर्क


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