शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

युवाओं में गुस्सा, कहा- राजनेताओं के बेटों को भेजों बॉर्डर पर

#पुलवामा अटैक : India Gate पर युवाओं का आक्रोश, बोलें - सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, वॉर हो

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शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

अरविंद केजरीवाल बनाम एलजी : सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अपडेट्स

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इंटरव्यू : बक्सर से बीजेपी नेता बिनोद चौबें

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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

क्या बैंको का लोन आम आदमी के लिये विज्ञापनो तक ही सिमित है?

बैंको के लोन देने का विज्ञापन आपने जरूर देखे होगें। इन विज्ञापनो को देखकर एक बार तो हम जैसे आम आदमी को तसल्ली जरूर मिलती है की कहीं लोन लेकर छोटे कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं।
जब लोन के पुछताछ के लिए बैंक मैनेजर से बात का सिल-सिला शुरू होता हुआ ,आखिरकार  यह बात का सिल-सिला निराशा का मोड़ ले लेता हैं। कह देते है मेरा ट्रान्सफर होने वाले है या अभी काम ज्यादा हैं एक महीने बाद आना  ,इस तरह के  न जाने मैनेजर और क्या क्या बहाना बनाता हैं।
मेरे साथ भी यही हुआ जब मै अपनी SBI होम ब्रांच(घर के नजदीक) में कॉलेज के द्वारा भेजे कागजात लेकर पत्रकारिता की स्नातक डिग्री के लिए लोन लेने गया।
आखिर क्यो आम आदमी के साथ यह छलावा किया जा रहा हैं। बड़े बड़े उद्योगपत्तियो को हजार करोड़ो में लोन आसानी से मिल जाता हैं। हम जैसे को केवल 4 लाख का लोन देने से भी कतराते हैं, जबकि हम लोन की सारी शर्ते पुरी करते ।

अभी विजय माल्या के बाद नीरव मोदी 11400 करोड़ के आस पास की बड़ी रकम लोन के रूप में डकार कर विदेश भाग गया। उसकी सारी संपति जब्त करे तो भी लोन उसका मात्र 20% रूपया कवर होगा  बाकी 80% रूपये तो कभी नही दे पायेगा। सरकार का तो क्या गया? वो तो अपना पांच साल राज करेगी ,और चली जायेगी। कुछ गया तो देश के ईमानदार लोगो के खुन-पसीने की कमाई के टैक्स का पैसा।

आम आदमी के लिए बैंको का लोन केवल विज्ञपन तक ही सिमित हैं।क्योकि बैंको से लोन लेने के लिए मैनेजर को राजी करना काफी मुश्किल काम हैं। आप और हम जैसे तो कर भी नही पाते हैं। कर पाते है तो सिर्फ वहीं जिनकी नेताओ व बड़ो लोगो से जान पहचान होती हैं। या फिर वही कर पाता है जिनकी खुद की पॉकेट गर्म होती है।
रामनगर उत्तराखण्ड के रहने वाले छोटे कारोबारी एन के ध्यानी बताते है कि  "बैक लोन लेना मतलब लोहे के चने चबाने के बराबर हैं। पिछले 10 साल से लगातार एक रिमोट एरिया उत्तराखंड में अपना इलैक्ट्रानिक उद्योग सुचारू रूप से चला रहा हूँ। और मेरा बैंक पिछले 10 साल से मेरे कारोबार से सन्तुष्ट है। लेकिन मैं जब भी कारोबार को बढ़ाने की कोशिश करता हूँ तो बैंक मैनेजर बहाने बना कर लोन बढ़ाने से टाल देते हैं। सरकार विज्ञापन देकर जनता को गुमराह करते रहती है। वैगैर लेनदेन या जानपहचान के बिना किसी को लोन मिलना बड़ा मुश्किल काम है।"

ध्यानी अकेले इस समस्या से परेशान नहीं हैं ।इस तरह से न जाने कितने छोटे कारोबारी अपने कारोबार को उड़ान नही दे पाते हैं। मुद्दा बड़ा गंभीर हैं। इसलिए सरकार को विचार कर बैंकिंग की लोन प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए कानुन बनाने को सोचना चाहिए।
लेखक व काव्य-सृजनकर्ता पुर्ण चन्द्र कान्दपाल कहते हैं की "बैंक के व्यवहार में जब तक बदलाव नहीं आएगा बैंक नहीं सुधर सकते । नियम के अनुसार बैंक कर्मियों को ग्राहक से शाखा में आने पर नमस्ते कहनी चाहिए । यह भी कहते हैं कि ग्राहक भगवान है । अपवाद को छोड़कर अधिकांश सरकारी बैंक कर्मी ग्राहक को आदमी तक नहीं समझते जबकि गैर-सरकारी बैंक ठीक से व्यवहार करते हैं । याद रखिये आप बैंकों को पुनः निजीकरण की ओर ले जा रहे हैं।"

वहीं, हाल नई दिल्ली में रहने वाले स्व-व्यवसायी संजीव कोहली बताते हैं कि "मै अब तक 6 बैंको में मुद्रा-लॉन के लिए आवेदन कर चूका हुँ..…वो भी LLP पंजीकृत हैं कंपनी....कोई ना कोई बहाना कर के लॉन देने से मना कर देते हैं।"
यह थी कुछ शख्स की व्यथा, अगर आप पुछने निकलोगो तो लाखो लोग ऐसी शिकायते करते मिल जायेगे। अब इसे बैंकिग सिस्टम की भ्रष्ट्रचार को पनाह देने वाली खाँमि न कहे तो और क्या कहे? क्योकि जरूरत मन्दो को लोन दिया नही जाता है और नीरव व विजया माल्या जैसो को लॉन देने के लिए बिना कुछ जांचे , पुरा बैंक ही  उन्हे सौंप देते हैं।
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लेखक व सम्पादक : अणदाराम विश्नोई ' पत्रकारिता विद्यार्थी'

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शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

एसएससी परीक्षा : 'युवा हल्लाबोल' की जीत, सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई समिति

• एसएससी मामले में युवा-हल्लाबोल की एक और जीत, परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई एक्सपर्ट समिति
• युवा-हल्लाबोल ने प्रेस कांफ्रेंस कर चेताया था सरकार को, बेरोज़गारी ख़त्म करने का पेश किया था रोडमैप
• 12 जनवरी को युवा हल्लाबोल के छात्र विवेकानंद जयंती पर करेंगे देश के 40 से ज्यादा शहरों में युवा-पंचायत, बेरोजगारी और परीक्षाओं में हो रही धांधली को लेकर बनाए मांगपत्रक को छात्रों से कराएंगे एडाप्ट
• 27 जनवरी को दिल्ली में होगा यूथ समिट, बेरोजगारी दूर करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाएगा युवा-हल्लाबोल


युवा हल्लाबोल, ssc scam,

दिल्ली, 10 जनवरी। एसएससी परीक्षाओं में होने वाली धांधली और भ्रष्टाचार के सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका की आज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की। छात्रों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पेश हुए और सरकार के हठधर्मी रवैये के खिलाफ एक बड़ी जीत हासिल की।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और स्वराज अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया और कहा कि यह समिति भविष्य में होने वाली परीक्षाओं में सुधार संबंधी सुझाव देगी। अदालत ने समिति सदस्यों के तौर पर इंफोसिस के पूर्व चेयरमैन नंदन नीलकेणी और कंप्यूटर वैज्ञानिक विजय भाटकर के नामों की तत्काल घोषणा कर दी, जबकि तीसरे सदस्य के नाम के लिए युवा-हल्लाबोल के याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण से सुझाव मांगा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि एसएससी मामले में जो सीबीआई जांच चल रही है, उसमें क्या प्रगति है, कितने आरोपी पकड़े गए और छानबीन का परिणाम अब तक क्या निकला। वहीं अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि SSC CGL 2017 की परीक्षा को क्यों न रद्द कर दिया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई अब 13 जनवरी को में होगी।

गौरतलब है कि युवा-हल्लाबोल ने दो दिन पहले ही 8 जनवरी को दिल्ली के प्रेस क्लब में एसएससी परीक्षाओं में हो रही गड़बड़ी समेत बेरोजगारी खत्म करने को लेकर प्रेस कांफ्रेंस किया था। प्रेस कांफ्रेंस के अगले दिन 9 जनवरी को युवा-हल्लाबोल के छात्रों-युवाओं ने अपनी मांगों को पूरा करने और राज्यसभा में बैठे सांसदों को अपनी आवाज सुनाने के लिए संसद भवन पर भी प्रदर्शन किया, जिसके बाद पुलिस द्वारा छात्रों की धरपकड़ भी हुई।

युवा-हल्लाबोल का नेतृत्व कर रहे अनुपम ने कहा कि दिल्ली के एसएससी हेडक्वार्टर से छात्रों का जो जोरदार आंदोलन शुरु हुआ, उसके बाद से ही लगातार युवा हल्लाबोल के साथी एसएससी के भ्रष्टाचार के खिलाफ और रोजगार की गारंटी के लिए संघर्षरत हैं। इस लंबी लड़ाई की यह पहली जीत है कि आज सुप्रीम कोर्ट ने समिति बनाने की हमारी मांग मान ली। हमें उम्मीद है कि समिति बनाने से भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के खात्मे और पेपर लीक की मॉडस आपरेंडी पर रोक लग पाएगी।

एसएससी परीक्षा के माध्यम से सीबीआई, रेलवे, विदेश मंत्रालय, जीएसटी, गृह मंत्रालय, डाक विभाग, सीएजी जैसे विभागों में अभ्यर्थियों को नौकरी मिलती है। SSC CGL में तीन चरणों की परीक्षा के बाद अंतिम रूप से चयनित होते हैं। 2017 की परीक्षा जिसपर धांधली का आरोप लगाया गया में इन तीनों चरणों की परीक्षा हो चुकी है।

युवा-हल्लाबोल से जुड़े अमित कुमार के मुताबिक बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हरियाणा में युवा हल्लाबोल की टीम रोज़गार के अवसर और चयन प्रणाली में सुधार को लेकर व्यापक अभियान चला रही है।
दिल्ली टीवी न्यूज़ नेटवर्क

रविवार, 6 जनवरी 2019

#संडे_कवर : कर्जमाफी बना वोटबैंक का हथियार

वोटबैंक भारतीय राजनीति में कोई नया शब्द नहीं हैं। आजादी के बाद कई दशकों से पार्टियां सत्ता हथियाने के लिए कई तरह से जुगाड़ और दांव-पेच लगाती रहीं हैं। जिसमें कभी सफलता मिल जाती हैं, और कभी निराशा भी। उसी में से एक हैं - वोटबैंक। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को तीन राज्यों में सत्ता हाथ लगी। इस जीत के पीछे के कारणों में से किसानों की कर्जमाफी भी एक अहम कारण माना जा रहा हैं।

कर्जमाफी, किसान,

वोटबैंक क्या हैं?
वोटबैंक का संबंध समाज के उस वर्ग से हैं, जो किसी कारण वश (राजनैतिक/धार्मिक/जातिगत इत्यादि) राजनीतिक दल को जीताने में योगदान देते हैं। उसे वोटबैंक कहते हैं।
अब कर्जमाफी वोटबैंक का कारण बनती जा रही हैं। राजनीतिक दल किसान वर्ग को कर्जमाफी का लालच देकर वोट हथियाने का जुगाड़ बना रहे हैं।

कर्जमाफी का वादा कर गया काम
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने वादा किया था कि सरकार बनते ही 10 दिन के भीतर किसानों का कर्जमाफ कर दिया जाएगा। जिसके कारण कर्ज से जुझते किसान कांग्रेस के वोटबैंक बन गए। जब चुनावी नतीजें आए, तो पांच राज्यों (मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़,मिजोरम और तेलगांना)  में से तीन राज्यों (राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) में बीजेपी को पटकनी देकर कांग्रेस ने सरकार बनाई। जिससे यह साबित कर दिया कि राहुल गांधी का वादा काम कर गया और कर्जमाफी अब एक वोटबैंक तौर पर भारतीय राजनीति में नया हथियार जुड़ गया।
विधानसभा चुनाव-2018 में मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के दो दिन के भीतर कांग्रेस सरकार ने किसानो का कर्ज माफ किया। इस पर पार्टी अध्यक्ष खुद राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा - "हमने 10 दिन में कर्जमाफी करने का वादा किया था लेकिन इसे दो दिन में कर दिखाया।"

कांग्रेस को देख, बीजेपी शासित राज्यों ने भी की कर्जमाफी
कांग्रेस शासित तीन राज्यों में कर्जमाफी के बाद आगामी चुनाव को मद्देनजर बीजेपी शासित राज्यों ने भी कांग्रेस की राह पर चलना शुरू कर दिया। क्योकि बाद में बीजेपी शासित राज्य गुजरात में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के नेतृत्व में किसानों का 625 करोड़ का कर्ज माफ किया गया। वहीं असम में 25 फीसदी किसानों का कर्ज माफ किया गया। जहां पर बीजेपी की सरकार हैं।
आपको बता यह भी दे कि उत्तरप्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित़्यनाथ ने करीब 30,729 करोड़ का कर्ज माफ किया था। वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा कर्ज से जुझते 35 लाख किसानों की कर्जमाफी की गई, जहां पर बीजेपी की सरकार हैं। अभी चर्चा यह भी हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए मोदी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को राहत देने की तैयारी में हैं, जिसका जल्द ही ऐलान होने वाला हैं।

जनहित मुद्दा यह हैं कि कर्जमाफी कोई स्थाई समाधान नहीं हैं। सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए राजनीतिक दल कर्जमाफी को वोटबैंक के रूप में हथियार बना रहे हैं। जिसमें किसानों का हित बहुत कम, राजनीतिक दलों का हित कहीं ज्यादा नजर आ रहा हैं। कर्जमाफी से राज-कोष पर वित्तिय बोझ बढ़ता हैं। इससे अच्छा हैं कि सरकार स्थाई समाधान ढुढ़ें।
✍ अणदाराम बिश्नोई

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

सीसैट पीड़ित UPSC छात्र पांच दिन से भूख-हड़ताल पर, लेकिन सरकार कर रही अनदेखा

• युवा-हल्लाबोल द्वारा समर्थित यूपीएससी छात्र कर रहे हैं क्षतिपूरक प्रयास की मांग
• ढाई सौ से ज़्यादा सांसदों के समर्थन पत्र के बावजूद छात्रों की सुनवाई न होना सरकार के युवा विरोधी चरित्र को दर्शाता है: अनुपम
• एसएससी से लेकर यूपीएससी तक छात्रों के हर प्रदर्शन के प्रति मोदी सरकार ने दिखाया है संवेदनहीन और अलोकतांत्रिक रवैय्या: युवा-हल्लाबोल


दिल्ली | यूपीएससी परीक्षाओं में क्षतिपूरक प्रयास की मांग को लेकर दिल्ली के मुखर्जीनगर में युवा-हल्लाबोल समर्थित सीसैट पीड़ित छात्रों का प्रदर्शन आज पाँचवे दिन भी जारी रहा। मांगों को लेकर पाँच छात्रों के भूख-हड़ताल पर बैठे होने के बावजूद अब तक सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक संवाद स्थापित नहीं किया गया है।

युवा-हल्लाबोल आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अनुपम ने बताया कि वर्ष 2011 में संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में सीसैट प्रणाली की शुरुआत की थी, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के प्रति भेदकारी था। बाद में निगवेकर कमिटी की रिपोर्ट ने पुष्टि किया कि सीसैट परीक्षा प्रणाली भारतीय भाषाओं के छात्र और ग़ैर-इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के ख़िलाफ़ था। इसी अन्याय के ख़िलाफ़ छात्रों की मांग रही है कि सीसैट के कारण जिन अभ्यर्थियों के बहुमूल्य वर्ष बर्बाद हुई उन्हें दो क्षतिपूरक प्रयास दिए जाएं।

प्रदर्शन कर रहे यूपीएससी अभ्यर्थी अंशु चतुर्वेदी ने बताया कि सीसैट के कारण हुए अन्याय के ख़िलाफ़ पाँच छात्र अनशन पर बैठे हुए हैं और हम अपना प्रदर्शन तब तक जारी रखेंगे जब तक कि सरकार हमारी मांग मान नहीं लेती। बड़े अफ़सोस की बात है कि मांग मानना तो दूर सरकार की तरफ़ से अब तक कोई भी हमारी सुध लेने भी नहीं आया है।

राज्य सभा में एनसीपी सांसद द्वारा यूपीएससी छात्रों का सवाल उठाया गया लेकिन सरकार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आया। राज्य सभा सांसद श्री संजय सिंह ने भी मुखर्जीनगर पहुँचकर पुलिसिया कार्यवाई पर सवाल उठाते हुए छात्रों की मांग का समर्थन किया।
UPSC Aspirant •1 विशाल, हरियाणा. 2 मनीष, बिहार. 3. शिखा, उत्तरप्रदेश
अनुपम ने सवाल किया कि जब यह पूर्णतः स्पष्ट हो चुका है कि सीसैट परीक्षा प्रणाली भेदकारी थी, तो इस विफल सरकारी प्रयोग से पीड़ित छात्रों को क्षतिपूरक प्रयास क्यूँ नहीं दिया जा रहा? हैरत की बात है कि ढाई सौ से भी ज़्यादा सांसदों द्वारा समर्थन पत्र के बावजूद मोदी सरकार छात्रों की मांग नहीं मान रही है। लेकिन मांग मानना तो दूर उल्टे प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ पुलिस द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।

एसएससी के छात्र जब सीजीओ कॉम्प्लेक्स में सड़कों पर बैठे थे तो पुलिस ने चादर, कंबल हटाने से लेकर शौचालय और पानी तक बंद कर दिया था। अब जब यूपीएससी अभ्यर्थी मुखर्जीनगर में बैठे तो इस कड़ाके की ठंढ में भी आग बुझाना, प्रदर्शनस्थल पर पानी फेंकना, ज़ोर ज़बरदस्ती और बार बार डिटेन करने जैसी कार्यवाई पुलिस कर रही है। यह मोदी सरकार की संवेदनहीनता ही नहीं, युवा-विरोध चरित्र को भी दर्शाता है।

अनुपम ने कहा कि सीसैट पीड़ित अभ्यर्थियों के साथ अगर न्याय नहीं किया गया तो यूपीएससी छात्र ही नहीं, देशभर के युवा एकजुट होकर सरकारी नीतियों पर हल्लाबोल करेंगे।