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जब जीना ही है तो उदास होकर क्यों

जिंदगी जीने का बहाना किसको नहीं चाहिेए. दिनभर की भागम-भाग के बीच हर कोई लाइफ में फुर्सत का पल खोजना चाहता है. जिसमें समा जाना चाहता है. जहां खुद को पा सके, महसूस कर सके, अपने आप को जान सके और हालात को देख सके. ये तभी संभव होगा, जब हम खुद के लिए वक्त निकालेंगे. P.C.- Internet जो अच्छा लगे उस पर ध्यान कीजिए. उम्मीद भऱी निगाहें आसमान पर डालिए. ऊंचाइयों को छूने का सपना देखिए. उसकी तस्वीर भी देख लिजिए, जो आपको सुकून देती हो.  क्योंकि इतना निरस बनकर लाइफ को यूं ही निकालने का कोई मतलब नहीं है .  जरा गौर किजिए, हम सब की मंजिल मौत है. ये ही दुनिया का सबसे बड़ा सच है. फिर हम क्यों इतने परेशान होते है ? जिस दिन आपने धरती पर पहला कदम रखा. उस वक्त आप क्या साथ लेकर आए. कुछ नहीं ना. फिर इतनी उदासी क्यों ? थोड़ा मुस्कराइए, गुलाब के फूलों की तरफ लाइफ में खुशी की महक लाइए. आप सोच रहे होंगे कि ये संभव कैसे है, जब आगे-पीछे इतनी परेशानी खड़ी हो. बताता हूं, ऐसे संभव है. देखिए, एक दिन हम सबकों इस दुनिया को अलविदा कहना है. कोई जल्दी जाएगा तो कोई बाद में. कौन कितना जिएगा पता नहीं है. लेकिन ये जरूर मालूम है कि
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कुरीतियों और शिक्षा के बीच पिसता ग्रामीण युवा

 शिक्षा के बोध से भय खत्म होता है। लेकिन ग्रामीण इलाकों से आने वाले युवक-युवतियों के सामने शिक्षा डर पैदा कर रही हैं।  डर हैं- समाज में पहले से मौजूद रूढ़वादी परम्पराओं से लड़ना। समाज के तथाकथित पंच-पटलों और ठेकेदारों का सामना करना। कहने को तो ये पंच-पटेल, अपने आप को समाज के रक्षक के तौर पर प्रदर्शित करते हैं। लेकिन हकीकत कुछ और हैं।  समाज कल्याण ये हैं कि हर शख्स के अधिकारों की रक्षा हो सके। आजाद फैसले अपने हित में ले सके। किसी समाज में अगर हर शख्स अपने हितों की रक्षा के लिए संघर्षरत नहीं है,  तो इसका मतलब ये हैं कि समाज उत्थान का काम हो रहा हैं। संघर्ष वहां करना पड़ता हैं, जहां अहित और अन्याय की बात होती हैं।  जब भी कोई नई शुरुआत होती हैं तो इसे जाने बिना लोग विरोध प्रदर्शन पर उतर आते हैं। उसे गलत नज़रिए से देखते हैं। ये लोग कोई और नहीं, बल्कि समाज के तथाकथित पंच-पटेल ही हैं।  शिक्षा हमेशा बदलाव लाने की पैरवी करती हैं। कुरीतियों से लड़ने के लिए आवाज उठाती हैं। लेकिन पंच-पटेल चाहते हैं ये   कुरीतियां जारी रहे ताकि उनकी "दुकानदारी" चलती रहें।  कम शिक्षित ग्रामीण इलाकों खासकर

राजनीति में पिसता हिंदू !

कांग्रेस की जयपुर रैली महंगाई पर थी, लेकिन राहुल गांधी ने बात हिंदू धर्म की. क्यों ? सब जानते है कि महंगाई इस वक्त ज्वलंत मुद्दा है. हर कोई परेशान है. इसलिए केंद्र की मोदी सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस ने राष्ट्रव्यापी रैली के लिए राजस्थान को चुना. लेकिन बात जो होनी थी, वो हुई नहीं. जो नहीं होनी चाहिए थी, वो हुई. साफ है कि हिंदुस्तान की राजनीति में धर्म का चोली-दामन की तरह साथ नजर आ रहा है. भारतीय जनता पार्टी मुखर होकर हिंदू धर्म की बात करती है. अपने एजेंडे में हमेशा हिंदुत्व को रखती है. वहीं 12 दिसंबर को जयपुर में हुई कांग्रेस की महंगाई हटाओ रैली में राहुल के भाषण की शुरुआत ही हिंदुत्व से होती है. राहुल गांधी ने कहा कि गांधी हिंदू थे, गोडसे हिंदुत्ववादी थे. साथ ही खुलकर स्वीकर किय़ा वो हिंदू है लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं है. यानी कांग्रेस की इस रैली ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. बहस है- हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी. इस रैली का मकसद, महंगाई से त्रस्त जनता को राहत दिलाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था. महंगाई हटाने को लेकर अलख जगाने का था. लेकिन राहुल गांधी के भाषण का केंद्र बिंदु हिंदू ही रह

आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटते संस्कार

किसी भी देश के लिए मानव संसाधन सबसे अमूल्य हैं। लोगों से समाज बना हैं, और समाज से देश। लोगों की गतिविधियों का असर समाज और देश के विकास पर पड़ता हैं। इसलिए मानव के शरीरिक, मानसिक क्षमताओं के साथ ही संस्कारों का होना अहम हैं। संस्कारों से मानव अप्रत्यक्ष तौर पर अनुशासन के साथ कर्तव्य और नैतिकता को भी सीखता हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह हैं कि स्कूल और कॉलेजों में ये चीजें पाठ्यक्रम के रूप में शामिल ही नहीं हैं। ऊपर से भाग दौड़ भरी जिंदगी में अभिभावकों के पास भी इतना समय नहीं हैं कि वो बच्चों के साथ वक्त बिता सके। नतीजन, बच्चों में संस्कार की जगह, कई और जानकारियां ले रही हैं। नैतिक मूल्यों को जान ही नहीं पा रहे हैं।  संसार आधुनिकता की दौड़ में फिर से आदिमानव युग की तरफ बढ़ रहा हैं। क्योंकि आदिमानव भी सिर्फ भोगी थे। आज का समाज भी भोगवाद की तरफ अग्रसर हो रहा हैं। पिछले दस सालों की स्थिति का वर्तमान से तुलना करे तो सामाजिक बदलाव साफ तौर पर नज़र आयेगा। बदलाव कोई बुरी बात नहीं हैं। बदलाव के साथ संस्कारों का पीछे छुटना घातक हैं।  राजस्थान के एक जिले से आई खबर इसी घातकता को बताती हैं। आधुनिकता में प

गरीब युवाओं से आह्वान: बड़ा करना है तो शिक्षा बड़ा हथियार

भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है, महात्मा गांधी के इस कथन का महत्व तब बढ़ जाता है. जब गांवों से टैलेंट बाहर निकलकर शहर के युवाओं को पछाड़ते हुए नए मुकाम हासिल करते है. ऐसी कहानियां उन लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन जाती, जो पैदा तो भले ही गरीबी में हुए हो. लेकिन हौसलों से आसमान छूना चाहते है. यब बातें सुनने जितनी अच्छी लगती है, करके दिखाने में उतनी ही कठिनाइयों को सामना करना पड़ता है. सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जुनून, धैर्य और लगन जरूरी है.   (P. C. - Shutterstock)  सोचिए एक गरीब परिवार में जन्मे युवा किन-किन कठिनाइयों से गुजरता होगा. गरीबी में पैदा होना किसी की गलती नहीं है. गरीबी में पैदा हुए युवाओं को शिक्षा से वंचित नहीं होना चाहिए. शिक्षा ही वो सबसे बड़ा हथियार है. जिससे गरीबी रेखा को लांघकर समाज कल्याण का काम कर सकते है. परिवार को ऊपर उठा सकते है. दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शुमार बिल गेट्स का यह वक्तव्य किसी प्रेरणा से कम नहीं है. बिल गेट्स कहते है कि  '' अगर गरीब पैदा हुए तो आपकी गलती नहीं, लेकिन गरीब मरते हो तो आपकी गलती है'' भारत में करीब 32 फीस

100 के पार पेट्रोल, फिर क्यों ना हो 'सरकार' ट्रोल !

 महंगाई शब्द गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों का कभी पीछा नहीं छोड़ता. इस बार महंगाई के टेस्ट में पेट्रोल की कीमत ने शतक लगा दिया. राजस्थान के श्रीगंगानगर में कीमत तीन अकों में पहुंच गई. ऐसा पहली बार हुआ है. आमजन में तराहीमाम मचा हुआ है. केंद्र सरकार मिशन बंगाल में व्यस्त है.  प्रदेश सराकरें भी बहती गंगा में हाथ धो रही है. यानी केंद्र सरकार ने तेलों की बढ़ी कीमतों का चाबुक चलाया, तो वहीं राज्य सरकारें भी वैट बढ़ाकर रेवेन्यू जुटाने की जुगत में लगी है.  वहीं पड़ोसी देश हम भारतीयों को खुब चिढ़ा रहे है.... क्योंकि भारत से पेट्रोल-डीजल कीमते, पड़ोसी देशों में सस्ता है, बात करें कि श्रीलंका की तो, यहां 60.26 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल मिल रहा है. भूटान में 49.56 रुपए प्रति लीटर है.  इतना ही नहीं, दूसरे देशों से आर्थिक मदद की भीख मांगने वाले हमारे 'प्रिय दुश्मन' पाकिस्तान में 51.14 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल मिल रहा है. कंगाली से जूझ रहा पाकिस्तान भी पेट्रोल को लेकर आवाम पर रहमत पर कर रहा है.  लेकिन हिंदुस्तान में, चाहे कोई भी सरकारे हो, रेवेन्यू बढ़ाने के लिए आतुर रहती है.  वहीं नेपाल में ओली क

नाम बदलने से बदल जाएगी सूरत ?

आपने यह तो सुना होगा- नाम में क्या रखा है.... तो फिर क्यों सरकारें नाम बदलने में लगी है. यह सवाल एक नागरिक के मन में उठना चाहिए. क्योंकि 2018 में योगी सरकार ने उत्तरप्रदेश के शहर इलाहाबाद का नाम बदल दिया. इलाहाबाद से प्रयागराज कर दिया. अब महाराष्ट्र की महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार औरंगाबाद का नाम बदलने जा रही है. हालांकि कांग्रेस ने प्रस्ताव का विरोध करने को ठाना है. सन् 1995 में भी शिवसेना ने औरंगाबाद का नाम बदलने की मांग की थी. अब करीब 2 दशकों बाद शिवसेना के मुख्यमंत्री है. शिवसेना की मुखपत्र सामना में एक आलेख प्रकाशित हुआ है. जिसमें उल्लेख है कि जल्द ही सीएम उद्धव ठाकरे, औरंगाबाद का नाम बदलने वाले है. औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजीनगर किया जाएगा. शिवसेना का कहना है कि मुगल सेक्युलर शासक नहीं थे.  लग रहा है नाम बदल कर शिवसेना हिंदुओं का दिल जीतना चाहती है. ताकि हिंदू वोट बैंक में खोई हुई साख को वापस पाया जाया.  एक समय था. शिवसेना में BJP से ज्यादा हिंदू समर्थक जुटते थे. लेकिन जब से शिवसेना ने कांग्रेस के साथ गठबंधन का दामन थामा है. तब से शिवसेना से हिंदुओं का लगाव बाकी राज्यों में कम