रविवार, 17 जून 2018

तस्वीर-एँ-बयाँ: यहाँ 'न्याय आपके द्वार' शिविर बदल गया "खर्राटे आपके द्वार" में



मदासर(पोकरण) में 15 जून को लगे राजस्व लोक अदालत 'न्याय आपके द्वार' शिविर में अधिकारियों का काम इस तस्वीर में बयाँ हो रहा है। यह स्पष्ट रूप से शिविर की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़ा कर रही हैं। तहसीलदार श्री भगाराम के पास बैठे गिरदावर श्री रामप्रताप खर्राटे भरते हुए।

बुधवार, 13 जून 2018

तस्वीर-एँ-बयाँ : इसे कहते है पत्रकारिता का जूनुन

जोधपुर से ईटीवी राजस्थान ( अभी News18Rajasthan ) के पत्रकार अपने हाथ में फैक्चर होने पर भी आज से ठीक 1 साल पहले सलमान की सुनवाई की कवरेज देने कोर्ट पहुंच गये थे। इनका नाम शेखर व्यास हैं।

रविवार, 10 जून 2018

#LetIndiaShine : कैटरीना जैसी गर्लफ्रैंड, रणबीर जैसा बॉयफ्रैंड चाहिए तो करे यह काम ?

स्वच्छ भारत अभियान की बातें तो हर कोई करता है , तो क्या हर कोई इसका कदर करता हैं? वाकई देश से गंदगी दुर हो रही हैं? Let Shine India कैम्पेन कुछ इस तरह का ही हैं, आइये जाने और कुछ सीखे !!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियो को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिये महात्मा गांधी की जयन्ती के अवसर पर सन् 2014 में स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की थी। उसके बाद हमने देखा कि देश में एक जागरूकता की लहर फैली थी, कईयो ने सड़क साफ की तो कईयो ने बाहर सड़क पर खुले में कचरा न फेंकने की शपश ली। परन्तु समय के साथ यह धीरे-धीरे यह सफाई की पकड़-धकड़म ठंडे बस्ते में चली गई । 

इसलिए अब कई NGO और संगठन इन्हे वापस जीवित करने के लिये प्रयासरत हैं। उनमें में एक कैम्पैन हैं - Let India Shine
इस कैम्पेन की शुरूआत किसी बड़े व्यक्ति ने नहीं की हैं , बल्कि हम जैसे ही एक आम इंसान ने की हैं। इस कैम्पैन के संस्थापक वेद प्रकाश हैं।

क्या है Let India Shine
वैसे देखा जाये यह एक आम इंसान का देश-प्रेम हैं, जो हम सब में होना चाहिए। वेद प्रकाश कहते है , " मोदीजी का काम देश के स्वच्छ रखने के अभियान शुरू करने था बल्कि देश को स्वच्छ रखने जिम्मेदारी हमारी ही हैं। जिसे हम भूल चूके हैं। बस इसको याद दिलाने के लिए मै यह सब कर रहा हुँ।" 
उनका यह भी मानना है कि आज के समय में कुछ अलग हट किये बिना जागरूकता फैलाना कठिन काम हैं। तभी तो लोग स्वच्छ भारत अभियान के बड़े पैमाने पर चलने के बावजूद गंदगी करते नहीं झिझकते हैं। इसलिए प्रकाश ने एक अनुठा तरीका अपनाया हैं। इस कैम्पेन में वो अपने ऑफिस की छुट्टी के दिन हर सप्ताह मेट्रो स्टेशन के आस-पास, जहां पब्लिक मुवमेंट ज्यादा हो, वहां हाथ मे तख्ती लेकर अपनी टीम के साथ खड़े हो जाते हैं। उस तख्ती पर कई मजेदार स्लोगन लिखे होते हैं।
जैसे कुछ इस प्रकार है :
 'गर्लफ्रैन्ड/बॉयफ्रैन्ड चाहिए तो देश के गन्दा मत होने दिजिए' 
'चिक-चिक करने वाली बीवी की कसम मै देश को गन्दा नही होने दुँगा'
वाकई इसमें लोग दिलचस्पी ले रहे हैं, और प्रण करके जाते है कि मै देश को गन्दा नहीं होने दुँगा।

कैसे आया यह ढांसू आइडिया ?
इस पुरे कैम्पैन की देन प्रकाश की खुद की गर्लफ्रैंड ही हैं। इसके पीछे की कहानी बड़ी रोमांचक व प्रेरणादायक हैं।
करीब शाम का वक्त था। ठंडी हवा दोनो के पास से सरसराती गुजर रही थी। वह अपनी प्रेमिका के साथ मुंबई के बांद्रा ब्रिज पर बैठकर एक-दुजे से बतिया रहे थे। जो कि देश का हर प्रेमी-जोड़ा करता हैं। इसमें कोई नई बात नहीं थी। इतने में उसका ध्यान आस-पास पड़ी गंदगी व कचरा पड़ा। दु:खी मन से लेकिन एक राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर प्रकाश से कहा, "देखो ! लोग कितने नि:संकोची हो गये, प्रधानमंत्री जी के द्वारा इतना कुछ करने बावजूद भी साफ-सफाई की फ़िक्र नहीं और सार्वजनिक स्थानो पर कचरा यूँ ही फेंक देते हैं। प्रकाश क्यों ना! हम कुछ इस संबंध में कुछ करे "
परन्तु यह बात नई थी। क्योकि अमुमन देश हित के लिए विरले ही प्रेमी जोड़े बात करते हैं।
फिर प्रकाश ने उन्हे वादा किया कि वो कुछ जरूर करेगे इस पर। उसी दिन देर शाम को एक पोस्टर  प्रिन्ट करवाया कर उसे सरप्राइज दिया । पहले पोस्टर का स्लोगन " अपनी गर्लफ्रैंड की कसम, देश की सफाई में योगदान करे।" था।
इसके बाद बाहर पब्लिक पैलेस पर दोस्तो के साथ पोस्टर लेकर खड़े रहने लगे। फिर यह सिल सिला चल पड़ा। लोगो का साथ मिलने लगा, हर कोई यह देखकर देश की सफाई को लेकर अपने आप को जागरूक करने लगा।

हम भी सीखे
अब प्रकाश मुबंई से दिल्ली आने के बाद ,सप्ताह में दो दिन सार्वजिनक जगहो पर अपनी टीम के साथ खड़े रहते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर कचरा  उठाते भी हैं। 
Let shine India
वेद प्रकाश अपनी टीम के साथ सफाई करते हुवें
हमे भी इस देश की सफाई के बारें में सोचना चाहिए और खुद अब से प्रण करे कि सार्वजनिक जगह पर कचरे को डस्टबीन में ही फेकेगे। लोगो को भी जागरूक करेगे। अगर आप भी  इस मुहिम में शामिल होना चाहते हो तो नीचे सम्पर्क सुत्र हैं। 

कौन हैं वेद प्रकाश 
दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस पर वेद प्रकाश कैम्पेनीग करते हुवें
वेद प्रकाश Let India Shine कैम्पेन के संस्थापक हैं। जिसकी शुरूआत आज से करीब 2 साल पहले मुंबई से की थी। वर्तमान में लीला पैलेस होटल में जॉब करते हैं और दिल्ली में रहते हैं। 
✍ अणदाराम  बिश्नोई
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रविवार, 27 मई 2018

स्लीपर यान में नहीं था चार्जर पॉइन्ट, ट्वीटर पर की शिकायत पर रेल मंत्रालय ने लिया संज्ञान । आप भी सीखे कुछ !

ट्वीटर पर रेल मंत्रालय को शिकायत लिखी थी कि मै जिस स्लीपर यान में यात्रा कर रहा हुँ। वहां पर कहीं भी चार्जर पॉईट/सॉकेट नहीं हैं। जिस के कारण यात्रीयो को अपने मोबाईल चार्ज करने में परेशानी आ रही हैं। खासकर लंबी दुरी के यात्रीयों को। किसी को E/SMS टिकट दिखाने में समस्या आ सकती है , अगर एन वक्त मोबाइल की बैंट्री धोखा दे तो।


इस पर रेल मंत्रालय ने तुरन्त संज्ञान लिया और संबंधित कार्यकारी अधिकारियो इस समस्या को ठीक करने का निर्देश दिया।

दोस्तो ! मेरा इस पोस्ट के लिखने का  उद्देश्य सिर्फ आपको यह बताना कि कही भी कुछ गलत हो रहा है या कोई समस्या हैं और जिसकी जिम्मेदार सरकार हैं। तो हमें उसे नज़रअन्दांज नहीं करना चाहिए लेकिन अकसर लोग ऐसा करते हैं जब उसका खुद से कोई लेदा-देना ना हो ।
जो समाज व देश हित के लिये ठीक नहीं हैं। आज ट्वीटर एक ऐसा माध्यम हैं जहां पर हम अपनी बात को सीधा सरकार तक पहुंचा सकते हैं। इसलिए छोटा-छोटी बातो को नज़रअन्दांज न कर पहल कीजिए।
- अणदाराम बिश्नोई


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सोमवार, 7 मई 2018

कहां बसता है केवल करोड़पति लोगों का गाँव और कैसे करेगी आपकी जैकेट आपके स्मार्टफोन को चार्ज !! जाने

करोड़पति लोगों का गांव, यह है गुजरात के कच्छ जिले में। आखिर यह कैसे बना करोड़पति लोगों का गांव । जाने-


इस गांव मे आप अगर घुसोगे तो दंग रह जावोगे। आपको विश्वास नही होगा कि  क्या मैं वाकई भारत  के एक गांव में खड़ा हुँ !
इस गांव की चमक-दमक देखते ही बनती हैं, सब-कुछ साफ सुधरा...। अच्छी सड़के। 

गुजरात के कच्छ में स्थित यह गांव सबसे अलग हैं। क्योकि यहां पर सब करोड़पति हैं। इस गांव का नाम बल्दिया हैं, जो गुजरात का सबसे धनी गांव हैं। यहां बैंको में अरबो रूपय जमा हैं। चमक-दमक और समृद्धी के मामले में यह गांव बड़े-बड़े शहरो को भी पीछे छोड़ता हैं। इसका कारण यह हैं कि इसके ज्यादातर लोग विदेशो में हैं। पिछले दो सालो में यहां के बैकों में 1500 करोड़ रूपय और डाकघर में 500 करोड़ रूपय जमा हुए हैं।

यह तो थी एक करोड़पति गांव की दास्तां, अब जाने कैसे करेगा आपका जैकेट आपके स्मार्टफोन को चार्ज !!

यह थोड़ा सुनने मे भले ही अजीब़ लगे कि आखिर भला जैकेट स्मार्टफोन को कैसे चार्ज करेगा ,लेकिन यह हकिकत है !


क्योकि अब 'स्नो-सी स्मार्ट जैकेट' आ गया हैं। जो आपके स्मार्टफोन को बिना किसी वायर के 40 मिनट में चार्ज कर सकता हैं।

इस स्मार्ट जैकेट को अमेरिका के यूटा राज्य के शहर साल्ट सिटी की वैब टेक्नोलॉजी कंपनी ' द वेब्स' ने बनाया हैं। इस जैकेट में 3000 mAH की बैटरी लगी हैं।इसके जरिए उन स्मार्टफोन को चार्ज कर सकते हैं  जिनमें बिना तार लगाए चार्ज होने का फीचर दिया गया हो।

इस जैकेट में इलेक्ट्रिक सर्किट को इतना बेहतर ़व सुरक्षित बनाया गया हैं कि इसे तेज बारिश और ठंड में भी उपयोग में लाया जा सकता हैं। जैकेट में बैटरी को बिल्कुल नीचे की ओर लगाया हैं, ताकि इससे कोई परेशानी न हो।
✍ अणदाराम  बिश्नोई

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शनिवार, 5 मई 2018

28 साल से बेघर इधर है ! सरकार का ध्यान किधर है ?

प्रधानमंत्री आवास योजना यहां बेघर लौगो पर काम क्यो नही कर रही है? क्या इन गरीबो को जिन्दगी भर बिना घर रहना ही नसीब है? न जाने भारत में कितने गरीब लौग इस तरह से बिना घर रहते होगें।

जाने आगे-
कहना कितना अच्छा लगता है राजनेताओ को कि "हम देश की जनता के सेवक हैं, मैं गरीबी से गुजरा हुँ ! मुझे मालूम है  गरीबी का कष्ट कितना दु:खदायी होता हैं।"
        यह सब हमें भी नेताजी के श्रीमुख से सुनने पर काफी सुकुन दिलाता हैं। परन्तु क्या आपने कभी गौर किया हैं कि यह महान नेताजी जो प्रवचन ( भाषण में चुनावी वादे) सुना रहे हैं । उसमें वो कितना अमल करते हैं? यह गरीबों के हितो की बातें तो खुब अच्छे से करते हैं परन्तु क्या जमीनी स्तर पर इन्होने काम किया हैं?
यह सवाल दिखने में काफी साधारण लग रहे हैं लेकिन जनाब ! इनके जवाब देने में नेताओं के कंपकंप छूट जाती हैं।

मै यह आज इतने सवाल इसलिए कर रहा हुँ क्योकि जब हम कहीं बड़े शहर के बाहर इधर-उधर ताक-झाक करते है तो मैने जो उपरोक्त सवाल पूछे हैं , यह अपने आप आपके दिलों-दिमाक में आने शुरू हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ जब दक्षिणी दिल्ली में विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लोट्स टेंपल के ठीक सामने कुछ दुरी पर स्थित औखला मेट्रो स्टेशन की तरफ जाने लगा।

यहां पर बेघर परिवार रहते है जो अपने आप में उभरते भारत की एक अलग तस्वीर दिखा रहे है। जिसने मुझे यह आलेख लिखने के लिये मजबुर किया !!

100 से ज्यादा झुग्गीयाँ
तिरपाल से बनी हुई झुग्गी इनके लिये घर हैं, चाहे मौसम कैसा भी हो। बरसात में रहना मुश्किल हो जाता हैं। कीचड़ फैलने की वजह से मलेरियाँ व डेंगूँ जैसी भयावह बीमारी फैलने का भी डर सताता रहता हैं। यहां का निवासी कहता हैं "हमारे यहां पर करीब 100 से ज्यादा परिवार झुग्गी  बना कर रह रहे हैं।" 


अधिकतर गाँव-देहात से
जो भी यहाँ पर रहता हैं इनमें से अमुमन बिहार व झारखण्ड के गाँव-देहाती इलाको से हैं।
        झारखण्ड से 6 महीने पहले आई 'कपुरी देवी' कहती हैं कि "गाँव मे  5-6 महीने खेती की और फसल सीजन ऑफ  हो जाने पर  दो  वक्त रोटी  का जुगाड़  के लिये परिवार सहित शहर आ गये । यहां पर दिहाड़ी मजदुरी करते हैं"

यह भी पढ़े: कभी झोपड़-पट्टी में पला-बढ़ा और आज बिघेर रहा बॉलीवुड में जलवा

इस कपुरी देवी की तरह अधिकतर परिवार यहां काम की तलाश में आये हुवें हैं। इनमें सें कुछ यही जम जाते हैं और मजदुरी करके अपने परिवार का जैसे-तैसे पेट पालते हैं। जब वहां रहने वाले और लोगो से बात की तो पता चला कि कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो 28 सालो से यहीं रहते हैं। परन्तु इनको कभी घर नसीब नहीं हुआ हैं।

प्राथमिक शिक्षा के भी पड़ रहे लाले !
जब बच्चो से बात की तो पता चला कि ज्यादातर बच्चे तो स्कुल जाते ही नहीं हैं। क्योकि दिहाड़ी इतनी अधिक नहीं मिलती हैं कि बच्चो को माता-पिता स्कुली शिक्षा दिलवा सकें।
इतने में मुलाकात यहां झुग्गीयों में रहने वाली दो बालिकाएँ रेखा व रेश्मा से हो जाती हैं। वो बताती है "वो दोनो बड़ी होकर टीचर तथा इन्जीनियर बनना चाहती हैं" ।
जिससे साफ जाहिर हो रहा है कि बच्चों में कुछ करने का हौंसला हैं। परन्तु गरीबी की दल-दल सपनो को आगे उड़ान भरने में आड़ा आ रहा हैं।

यह तो एक शहरी इलाका का दृश्य हैं । आप खुद सोचिए की पुरे अपने देश भर में न जाने कितने ऐसे परिवार होगे , जो बेघर होकर जीवन जीने का संघर्ष कर रहे हैं।
✍ अणदाराम  बिश्नोई

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