रविवार, 9 जून 2019

#दानवों_को_फांसी_हो: हैवानियत दानवों जैसी, तो फिर मानवाधिकार क्यों?

यह भारत देश हैं. जहां दानव भी मानव के रूप में रहते हैं. हां ! सोच क्या रहे हो. बिल्कुल सही पढ़ा हैं आपने. लेकिन डरिए मत. और अगर आप भी भारतीय हैं तो सिर को शर्म से मत झुकाइएं. बस इस लेख को पढ़ते जाइएं... क्योंकि हैवानियत की इतनी हदें पार हो चुकी है इस देश में... कि शर्म खुद सिर झुका रही हैं. उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ में आपसी रंजिस में मासूम के साथ दुष्कर्म-हत्या का मामला, इस देश का सिर्फ इकलौता और पहला नहीं हैं. इस से पहले भी कई मामले सामने आए. लेकिन हुआ क्या ? बस वहीं तुच्छ राजनीति और लीपापोती. सवाल यह नहीं हैं कि दोषियों को सबक मिला या नहीं ?  सवाल है, दोषियों की सजा से क्या सबक मिला उन्हे. जो दानव बाहर मानव का मुखौटा लिए घूम रहे हैं. और एक नये अपराधी के रूप में सामने आते हैं.

CHILD ABUSE, ALIGARH RAPE CASE, CHILD MURDER

यह तभी संभव होगा, जब सजा भी दानवों जैसी हो. और क्या ? यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी कि लोहा, लोहा को काटता हैं. यह कहावत यहां पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं. 10 हजार की रकम मासूम ट्विंकल के पिता नहीं चुका पाए, तो उसमें मासूम का क्या दोष ?
370 मे से 13 वर्षों में सिर्फ 4 को फांसी
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स के अनुसार पिछले दस सालों में बच्चों के प्रति 500 फीसदी अपराध बढ़ा हैं. जो कि भारत जैसे देश के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं. बच्चो की सुरक्षा माता-पिता के लिए एक चुनौति बन गई हैं. इन कलयुगी दानवों से बेटियों को हर हालत में बचाना होगा. लेकिन रूह कंपा देने वाला सवाल, आखिर बचेगी कैसे ? क्योंकि पिछले 13 सालों में 370 से अधिक अपराधी जेल में हैं. उन में से सिर्फ चार को ही  फांसी की सजा हुई. इसे कानून का अंधापन कहना गलत नहीं होगा. क्योंकि जेल में बंद दानवों को पहचान नहीं पा रहा हैं. उन्हे मानव समझकर मानवाधिकारों का हवाला देकर फांसी की सजा होने से बचाया जाता हैं. जैसे कि 13 सालों के आंकड़े साफ दिखा रहे हैं कि सिर्फ 370 प्लस अपराधियों में से सिर्फ चार को सजा. यह कहां जायज हैं, दानवों को छोड़ना.

अलवर के थानागाजी मामले में किस तरीके दरिंदगी की गई. उसे यहां लिखना भी संभव नहीं हैं. आखिर समझ में नहीं आता इस तरह के दरिंदे को समाज अपने साथ रखता कैसा हैं.

अब भारत के कानून से यही मांग की – हे कानून ! तू कब तक अंधे बना रहोंगे. क्या तुम्हे बेटियों की फक्र नहीं ? बस इन दोषियों को ऐसी फांसी दो कि इस धरती के बाकि के दानवों की भी रूह कांप जाए. या तो यह दानव वापस मानव रूप धारण कर लेगें. या फिर इनकों परलोक का द्वार मिल जाएगा.

अगर आप भी माता-पिता हैं तो आपको जरूर सोचना चाहिए और आवाज भी उठानी चाहिए बेटियों की सुरक्षा की. क्योकि अब दानव के रूप में मानव कहीं भी मिल जाएगें. इनसे बचना एक चुनौति हैं.

 अणदाराम बिश्नोई

बुधवार, 5 जून 2019

अब भी नहीं जागें, तो यह गर्मी मार डालेगी !

देशभर में तापमान बढ़ता जा रहा हैं. गर्मी से लोगों का हाल-बेहाल हैं. हाल ही दिनों की बात करे तो राजस्थान का चूरू शहर देश के सबसे गर्म शहरों में शिखर पर हैं. देश के 145 शहरों का तापमान 50 डिग्री के पार पहुंच गया. गर्मी लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं. गर्मी के साथ दूसरी समस्या पेयजल की किल्लत भी हैं. बात करे महाराष्ट्र के मराठावाड़ा की तो कई बांध सूख चूके हैं. लोगों को नहाना-धोना तो दूर, पीने तक का पानी भी नसीब नहीं हो रहा हैं.

Global warming,  hit temperature

अब सबसे बड़ा सवाल, आखिर इन समस्याओं का समाधान कैसा मिलेगा ? क्यों हर साल कई लोगों को पानी की किल्लत और गर्मी से जान से गवानी पड़ती हैं. आखिर इनका पुख्ता समाधान कब और कैसे निकलेगा ?

खैर, सवाल पूछना आसान हैं. लेकिन समाधान ढूंढना आसान कार्य नहीं होता हैं.  आपके मन में अभी सवाल होगा कि आखिर समाधान कैसे निकलेगा. देखो !  किसी भी समस्या के कारण को हटा देने से समाधान अपने आप निकल जाता हैं. तो बस पहले यह जान लिजिए कि गर्मी आखिर क्यों बढ़ रही हैं.

क्यों बढ़ रही है यह गर्मी
ऐसा नहीं हैं कि सिर्फ भारत में तापामान वृद्धी देखने को मिल रही हैं. कई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हर साल धरती का तापमान बढ़ता जा रहा हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है ग्लोबल वार्मिग यानी भूमंडलीय उष्मीकरण. आइए जानते हैं क्या होता हैं भूमंडलीय उष्मीकरण.

हम सभी जानते हैं कि धरती पर सूर्य की रोशनी ही अंधकार मिटाती हैं. जब सूर्य की रोशनी धरती पर पहुंचती हैं तो इसके साथ कई हानिकारक किरणें भी होती हैं. जो धरती से टकराकर वापस अंतरिक्ष में चली जाती हैं. जिससे धरती पर रहने वाले लोग इन किरणों के हानिकारक प्रभावों से बच जाते हैं. लेकिन औद्योगिकीकरण और अन्य मानवीय गतिविधियों से कुछ ऐसी गैंसे धरती पर निकलती हैं, जो उपर जाकर वायुमंडल में एक आवरण (एक तरह से वायु की परत) बना लेती हैं.

सूर्य की रोशनी के साथ आने वाली हानिकारक किरणें, जिन्हे धरती से टक्कराकर वापस जाना होता हैं. उन किरणों को आवरण, वापस जाने नहीं देता हैं. जिस कारण सूर्य का तापमान बढ़ता हैं. यानी आवरण बनाने वाली गैंसे ही एक तरह से गर्मी बढने की जिम्मेदार हैं. धरती का इस तरह से तापमान बढ़ने को ही ग्लोबल वार्मिग(भूमंडलीय उष्मीकरण)  कहते हैं.

अब जो भी गैसें धरती से आवरण बनाने वाली निकलती हैं, उनका जिम्मेदार मानव यानी हम खुद हैं. यह गैसें आमतौर पर ए.सी., रेफ्रिजरेटर आदि से निकलती हैं. सोचो, जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी, मानव उतना ही गर्मी से बचने के लिए ए.सी. इत्य़ादि का इस्तेमाल करेंगा. जिससे और ज्यादा गैंसे निकलेगी. तो और ज्यादा गर्मी बढ़ेगी. जो कि देखने में भी मिल रहा हैं. सोचिए अब हम मानव कहां जा रहा हैं.

हर साल बढ़ रहा तापमान
हर साल तापामान में बढ़ोत्तरी देखने के मिल रही है. जो कि खतनाक हैं. अगर ऐसा ही होता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा कि धरती गर्मी से आग बन जाएगी. जिस कारण जिना दुभर हो जाएगा. यानी संक्षेप में कहे तो अब मानव (हम) नहीं जागे तो इसका परिणाम बहुत महंगा भुगतना पड़ेगा.

तो फिर क्या करें हम
यह स्लोगन आप और हम बचपन से पढ़ते- सुनते आ रहे हैं कि धरती माता करे पुकार, वृक्ष लगाकर करो श्रृंगार”. बस इसी स्लोगन को केवल पढ़ने और रटा-रटाया बोलने से काम नहीं चलेगा. इस स्लोगन को गंभीरता से लेना होगा. और जितना हो सके, ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना. पेड़ से ऑक्सीजन और ठंडक दोनो मिलती हैं. शायद आप कभी चिलचिलाती धूप में कभी पेड़ के नीचे रूके हो तो महसूस किया होगा.
-    - अणदाराम बिश्नोई

गुरुवार, 30 मई 2019

एक बार फिर मोदी सरकार, तो क्या EVM में गड़बड़ी हुई ?

नतीजे आ गए. एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 300 प्लस सीटें हासिल की. और खुद बीजेपी ने 303 सीटें हासिल की है. वहीं यूपीए सिर्फ 96 सीटों पर और कांग्रेस 52 सीटों पर सिमट कर रह गई हैं. इसी बीच एक बार  फिर EVM को विपक्ष मुद्दा बना रहा हैं. आपको बता दे कि नतीजों के एक दिन पहले विपक्ष की 22 पार्टियां इसी मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग के बाहर प्रदर्शन किया था. 

EVM hack

लेकिन चुनाव आयोग ने विपक्ष की सारी बातों को सिरे से खारिज कर दिया था. एक बात और, EVM  को लेकर पहले से ही विपक्ष सवाल उठाता रहा है. तो क्या विपक्ष, मुद्दा नहीं होने के कारण और हार का सामने होने से सवाल उठाता हैं ?या फिर वाकई EVM में गड़बड़ीसुरक्षा में सेंध लगाकर की जाती हैं यह सबसे बड़े सवाल हैं.
 क्योकि 2014 के बाद पांच साल मोदी सरकार रहीं. तो क्या पांच साल में मोदी सरकार ने इतना तोड़ निकाल लिया कि EVM  में सेंधमारी की जा सकती हैं ?इन सारे सवालों के बीच सवाल यह भी उठता हैं कि आखिर मोदी सरकार में ही EVM  को बदनाम किया जा रहा हैं. या फिर पहले भी ऐसा होता आया हैं ? 

नवम्बर 1998 में 16 विधानसभाओं के चुनाव में भारत में पहली बार EVM मशीन का उपयोग किया गया. यह 16 विधानसभा सीटें : 5-5 राजस्थान और मध्यप्रदेश की6 दिल्ली और एनसीआर की थी. उस वक्त केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी. और देश के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी थे.


2009 में EVM का BJP ने भी किया था विरोध


क्या आप जानते हैं कि आज 2019 में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने EVM का विरोध किया था. जो अब EVM का समर्थन कर रही हैं. 

लोकसभा 2009 में यूपीए ने कुल 262 सीटें हासिल की थी. वहीं बीजेपी ने 116 सीटें हासिल की थी. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार उस वक्त बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आठवाणी ने EVM को लेकर सवाल उठाएं. उसके बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने EVM की गड़बड़ी को लेकर देशभर में अभियान चलाया.

इस अभियान के तहत ही 2010 में भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा प्रवक्ता और चुनावी मामलों के विशेषज्ञ जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी. जिसका नाम 'डेमोक्रेसी एट रिस्ककैन वी ट्रस्ट ऑर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ?’ था.


विपक्ष EVM को लेकर जाएंतो जाएं कहां?


अब सवाल उठता हैं कि आखिर विपक्ष के EVM के सवालों पर बीजेपी यह क्यों कह रही है. कि विपक्ष का EVM का मुद्दा सिर्फ हार का हताशा हैं. यहां तक कि यह भी सोचने योग्य बात हैं कि चुनाव आयोग ने भी विपक्ष की बात को सिरे से खारिज कर दिया. क्योकि EVM एक मानव निर्मित मशीन हैं,दुनिया में ऐसी कोई मशीन नहींजिसे इंसान ने बनाया हो और हैंक नहीं किया जा सकता.

दूसरी बातअमेरिका में EVM की शुरूआत हुई थी. वो अब EVM को छोड़कर वापस वीवीपैट पर आ गया.  कुछ गड़बड़ या संदेह नहीं होता तो आखिर अमेरिका जैसा विकसित देश ने बदलाव का रूख क्यों अख्तिय़ार किया. इसलिए भारत को भी सोचना चाहिए.

हां, यह बात पच सकती हैं कि चुनाव आयोग का EVM पर सख्त सुरक्षा पहरा रहता हैं. लेकिन वहीं जिस तरह से EVM ले जाते हुए कथित संदिग्ध वीडियों सामने आए. यह वीडियोज सीधे तौर पर EVM सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठाते हैं.

अगर वाकई EVM सुरक्षा खतरे में हैं तो चुनाव आयोग को गंभीरता से लेना चाहिए. क्योकि जब भी चुनाव आता हैं , विपक्ष सिर्फ EVM को लेकर सवाल उठाने के अलावा , कुछ निष्कर्ष नहीं निकल पाता हैं. दूसरी बात विपक्ष के पास इसके अलावा कोई और ऑप्शन भी नहीं. यानी संक्षेप में कहे तो विपक्ष जाएं तो. जाएं कहां
✍ अणदाराम बिश्नोई

बुधवार, 15 मई 2019

युवाओं की असभ्य होती भाषा


दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में भाग-दौड़ व रफ़्तार भरी जीवन शैली में चिड़चिड़ापन होना अब स्वभाविक हैं. लेकिन इसके साथ खासकर युवाओं में बोल-चाल की भाषा में परिवर्तन दिख रहा हैं. या यूं कहें आज की युवा पीढ़ी की आपस में बोल-चाल की भाषा असभ्य हो गई हैं.
Stop abusing

अगर आप मेरी तरह युवा हैं तो इस बात को आसानी से महसूस भी कर रहे होगें. और हो सकता हैं कि आप भी अपने दोस्तों की असभ्य और भूहड़ शब्दों से परेशान होगें. मजाक में मां-बहन से लेकर पता नहीं क्या-क्या आज की युवा पीढ़ी दोस्तों के साथ आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. खैर यह अलग बात हैं कि यह सिर्फ ज्यादातर दोस्तों के समूह में होता हैं.
 
लेकिन याद रखना, कहीं भी हो. आखिर भाषा की मर्यादा तो लांघी जा रही हैं. यह एक तरह से भारतीय संस्कृति को ठेस पहुंचाना हैं. अगर इसे सुधारने की पहल नहीं की गई तो आने वाले वक्त में यह एक बड़ी समस्या बन जाएगी.

गंदे लफ़्ज की जड़ कहां

यह सवाल आपके मन में भी होगा. आख्रिर हम इतने असभ्य क्यों होते जा रहें हैं. यह बात कह सकते हैं कि महानगरों में तनाव व निरस भरी जिंदगी में व्यक्ति परेशानी के चलते अपनी एक तरह की भड़ास और गुस्सा गालियां बक कर निकालता हैं. हांलाकि यह भी ठीक नहीं हैं. आखिर गुस्सें की जगह जहर उगलते और भाषा की मर्यादा को तार-तार करने वाले लफ़्ज क्यों ? 


बात केवल युवाओं की नहीं हैं, अर्धयुवा, अधेड़ और बुजुर्ग भी गंदे लफ़्ज का इस्तेमाल करते नहीं चुकते. मौटे तौर पर किशोरों और बच्चों में कम देखने में मिलता हैं. हांलाकि यह फ्रैंड-सर्कल पर भी निर्भर करता हैं.

गंदी जबान पर लगाम हमें खुद ही लगानी होगी. एक शपथ लेनी होगी कि कभी इस तरह की असभ्य भाषा का इस्तेमाल नहीं करेंगें. भाषाई फुहड़ता को खत्म करना की पहल करनी होगी.

आप भी गंदी भाषा को कम करने की पहल किजिए. आपको यह लेख कैसा लगा. नीचे कॉमेंट बॉक्स में राय और सुझाव जरूर रखे.
 - अणदाराम बिश्नोई

रविवार, 17 मार्च 2019

2019 में मोदीजी को यह मुद्दें ले डूबेंगे ? : नज़रिया

हमारे देश में लोकसभा चुनाव कई मायनों में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब देश के सामने कई बड़े मुद्दें और पीएम मोदी जैसे चेहरे की पांच साल की साख दाव पर हो. आपको याद होगा कि 2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव की बाजी हार गई थी. 14 राज्यों में देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी. भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक यूपीए-2 (2014 से पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार) के 94 फीसदी मंत्री सांसद का चुनाव हार गए थे. यानी मोदी लहर के चलते कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था.

pm modi , modi 2019 ke mudde, मोदी के 2019 के चुनावी मुद्दे


वहीं बात करें बीजेपी की तो 2014 में बीजेपी की अब तक का सबसे बड़ी जीत थी. उस वक्त एनडीए में बीजेपी के साथ 29 दल साथ होने के बावजूद भी, बीजेपी अकेली सरकार बनाने में समर्थ थी. बहुमत के आंकड़े 272 को छूते हुए बीजेपी ने 282 सीट पर कब्जा किया था.

लेकिन इस बार 2019 में बात कुछ अलग हैं. जिस चेहरे के दम पर बीजेपी ने इतना अच्छा 2014 में अब तक का प्रदर्शन किया था, तो क्या पीएम नरेन्द्र मोदी का पांच साल काम काजों का रिपोर्ट कार्ड जनता को पसंद आएगा वो वादें क्या जनता को याद हैं, जिनके दम पर बीजेपी को भारी मत मिले थें. वो वादें क्या थें ? आपको याद हैं!

एक बार उन वादों और मुद्दें पर भी नजर डाल लेते हैं, जो 2014 में बीजेपी के थे. आतंकवाद, भ्रष्टाचार, कालाधन, मंहगाई और बेरोजगारी 2014 में बीजेपी के प्रमुख मुद्दे थें. अब हर किसी के मन में यह सवाल हैं कि इन मुद्दों पर पांच साल में बीजेपी सरकार यानी पीएम मोदी कितने खरें उतरें.

इन मुद्दों की उस वक्त क्या स्थिति थी और अब क्या स्थिति हैं. साथ में यह भी कि 2019 के चुनाव में क्या मुद्दें रहने वालें जो पीएम मोदी पर भारी पड़ सकते हैं तथा फिर पीएम बनने की डगर को कठिन कर सकते हैं. आइए जानते हैं.

नोटबंदी: 99 फीसदी नोट वापस आ गए

आपको 8 नवम्बर की रात याद होगी, जब पीएम मोदी ने आश्चर्यजनक रूप से ठीक आठ बजे टीवी पर पांच सौ और एक हजार के नोट पर बैन होने का एलान कर दिया था. रातोंरात पूरा देश सड़कों पर आ गया. कई लोग बैंक की लाइन में खड़े रहते ही मौत के शिकार हो गए थे.


यूपी में गर्भवती महिला की बैंक लाइन में ही डिलीवरी हो गई. बाद में यूपी के पूर्व सीएम तथा सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बच्चें को गोद लिया और उसका नाम भी खजांची रखा. इस तरह से आम जनता ने कई परेशानियां नोटबंदी के दौरान झेली थी.

नतीजा यह रहा, आरबीआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 99 फीसदी से अधिक नोट वापस बैंको में आ गए. यानी नोटबंदी के दौरान केवल एक फीसदी से भी कम कालाधन सामने आया. जाने-माने कई अर्थशास्त्रियों ने भी नोटबंधी को विफल करार दिया. तत्कालीन आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन ने एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ी लेकिन भारत में नोटबंदी के वजह से इसका उल्टा हुआ. सकल घेरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर भी भारत में सुस्त हो गई.

जीएसटी तकनीकी सर्वर से लेकर उपयोग तक कई खामियां

एक देश एक कर की तर्ज पर जीएसटी को लाया गया. पीएम मोदी के इस कदम को कर चोरी पर लगाम की पहल की तौर पर देखा जा रहा था. भले ही एक कर एक देश और भ्रष्टाचार की खत्म करने की भावना जुड़ी हो. परन्तु दुसरा सच यह भी हैं कि जीएसटी जुलाई 2017 में जब लागू हुई, तब से छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारियों को कई परेशानियों से दो-चार होना पड़ा. 

शुरूआत में तो जीएसटी व्यापारियों की समझ से परे थी. समझने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा. भले ही अब 2019 आ गया, लेकिन अभी भी सर्वर से लेकर कई सिस्टम तक को समझने बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं. संक्षेप में कहे तो व्यापारी वर्ग मोदीजी से काफी नाराज हैं. इसका असर भी 2019 के आम चुनाव में नहीं पड़ेगा. यह कहना ठीक नहीं रहेगा.

बेरोजगारी को लेकर युवाओं में जबरदस्त गुस्सा

2014 के आम चुनाव में  एक रैली के सम्बोधन में हर साल 2 करोड़ रोजगार देने की बात कहीं थी. इस वादे को पुरा करने में मोदी सरकार नाकाम रहीं. कांग्रेस का आरोप हैं कि पिछले साल एक करोड़ युवाओं को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

लेकिन दुसरा पहलू यह भी हैं कि समय के साथ पुरानी नौकरियां खत्म हो रही हैं. और नई तकनीक के आधार पर नई नौकरियां पैंदा भी हो रही हैं. लेकिन स्किल्स की कमी के चलते, जिस तरह से युवाओं को नौकरी गंवानी पड़ रही हैं. इसी संख्याबल मुकाबले युवाओं को नई जॉब नहीं मिल पा रहीं हैं. मिल भी पा रही हैं तो ज्यादातर युवा वेतन से असंतुष्ट होने के कारण जॉब करना पंसद नहीं करते हैं.

वहीं आंकड़ो पर नजर डाले तो एनएसएसओ के अनुसार साल 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1% थी. जो कि पिछले करीब 45 सालों में सबसे ज्यादा हैं.

ट्रिपल तलाक : मुस्लिमों में नाराजगी लेकिन महिलाओं की हक की लड़ाई

सरकार को तीसरी बार अध्यादेश लाना पड़ा. कांग्रेस पार्टी सहित विपक्ष के विरोध के चलते सदन में तीन तलाक बिल पास नहीं हो पाया. सायरों बानो जैसी मुस्लिम महिलाओं के लिए भले ही तीन तलाक बिल जिंदगी बदलने वाला हो. परन्तु मुस्लिम संगठन इससे नाराज हैं.

ऐसा नहीं हैं कि बिल के विरोध में केवल मुस्लिम पुरूष ही, ज्यादातर कम पढ़ी लिखी और कट्टर मुस्लिम महिलाएं भी विरोध में हैं. यानी इसका भी असर भाजपा के मुस्लिम वोटबैंक पर पड़ेगा.

भ्रष्टाचार : ‘चौकीदार चोर बनाम मैं भी चौकीदार

बीजपी सरकार ने 2019 के चुनाव में राहुल गांधी के पहले से दिए नारे चौकीदार चोर हैं को ही अपना चुनावी कैम्पेन का हथियार बना लिया. यानी हैशटैग मै भी चौकीदार नारे के साथ देशवासियों को जोड़ने का काम शुरू कर दिया. ट्विटर पर यह ट्रेंड करने लगा. पीएम मोदी खुद ने अपने नाम के आगे ट्वीटर पर चौकीदार लगा लिया. इसी तरह से उनके समर्थक भी सोशल मीडिया पर यह सब कर रहे हैं.
chowkidar pm modi,


खैर, जो भी हो मोदी राज में राफेल एक बड़ा भ्रष्टाचार का मुद्दा बना. अभी भी हैं. लेकिन विपक्ष इसे सही ढंग से पकड़ नहीं पा रहा हैं. इस मुद्दे पर उल्टे सीधे बयान देने से कई बार राहुल गांधी की भी किरकरी हो चुकी हैं. राफेल विवाद पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही हैं. इसी के साथ सीबीआई अफसरों के तबादले वाले बवाल को लेकर भी सरकार पर कई सवालिएं निशान उठते देखें गए.

कुछ भी कहो, जिस तरह से जोरदार तरीके से मोदीजी ने 2014 के चुनावी सभाओं में भ्रष्टाचार को लेकर हुंकार भरी थी. वैसा रूतबा मोदीजी प्रधानमंत्री बनने के बाद जमा नहीं पाए. कहीं न कहीं इसका असर बीजेपी के वोट प्रतिशत पर दिखेगा.

2019 के आम चुनावी समर में कौन बाजी मारेगा तथा उपरोक्त मुद्दों का कितना असर रहेगा, यह तो 23 मई को ही मतगणना में सामने आ पाएगा. लेकिन देशवासियों से अनुरोध हैं कि लोकतंत्र के इस पर्व में जरूर अपनी भागीदारी दिखाए. और एक जिम्मेदार सरकार बनाने में योगदान दें.

✍ अणदाराम बिश्नोई

रविवार, 3 मार्च 2019

तस्वीर-ए-बयां : बाइक, टीवी सब लेकिन सिर ढक्कनें के लिए नहीं हैं छत

यह दोनो तस्वीरें दिल्ली एनसीआर के एरिया‌ की हैं। पहली तस्वीर भूमीहीन परिवारों की‌ मजबुरी को बयां कर रही हैं। वहीं दुसरी तस्वीर परिवार के हालातों को व्यक्त कर रही हैं। बड़ा अचरज होता है कि टीवी तक हैं लेकिन जमीन नहीं होने के कारण पक्का घर नहीं बना पा रहे हैं।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

युवाओं में गुस्सा, कहा- राजनेताओं के बेटों को भेजों बॉर्डर पर

#पुलवामा अटैक : India Gate पर युवाओं का आक्रोश, बोलें - सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, वॉर हो

यदि वीडियो प्ले होने मेंं दिक्कत हो रही हैंं तो इसे आप Youtue पर देख सकते हैं ( यहां क्लिक करें)

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

अरविंद केजरीवाल बनाम एलजी : सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अपडेट्स

यदि वीडियो यहांं पर प्ले नहींं हो रहा हैंं तो आप इसे यहां क्लिक कर Youtube से‌ देख सकते हो।

इंटरव्यू : बक्सर से बीजेपी नेता बिनोद चौबें

यदि यह वीडियों यहांं पर प्ले नहींं हो रहा हैंं तो आप इसे Youtube पर देख सकते हो।