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आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटते संस्कार

किसी भी देश के लिए मानव संसाधन सबसे अमूल्य हैं। लोगों से समाज बना हैं, और समाज से देश। लोगों की गतिविधियों का असर समाज और देश के विकास पर पड़ता हैं। इसलिए मानव के शरीरिक, मानसिक क्षमताओं के साथ ही संस्कारों का होना अहम हैं। संस्कारों से मानव अप्रत्यक्ष तौर पर अनुशासन के साथ कर्तव्य और नैतिकता को भी सीखता हैं।


सबसे बड़ी दिक्कत यह हैं कि स्कूल और कॉलेजों में ये चीजें पाठ्यक्रम के रूप में शामिल ही नहीं हैं। ऊपर से भाग दौड़ भरी जिंदगी में अभिभावकों के पास भी इतना समय नहीं हैं कि वो बच्चों के साथ वक्त बिता सके। नतीजन, बच्चों में संस्कार की जगह, कई और जानकारियां ले रही हैं। नैतिक मूल्यों को जान ही नहीं पा रहे हैं। 

संसार आधुनिकता की दौड़ में फिर से आदिमानव युग की तरफ बढ़ रहा हैं। क्योंकि आदिमानव भी सिर्फ भोगी थे। आज का समाज भी भोगवाद की तरफ अग्रसर हो रहा हैं। पिछले दस सालों की स्थिति का वर्तमान से तुलना करे तो सामाजिक बदलाव साफ तौर पर नज़र आयेगा। बदलाव कोई बुरी बात नहीं हैं। बदलाव के साथ संस्कारों का पीछे छुटना घातक हैं। 

राजस्थान के एक जिले से आई खबर इसी घातकता को बताती हैं। आधुनिकता में पल रहा समाज किस और जा रहा हैं, यह सोचने को मजबूर कर देगी। खेल-खेल में सगे भाई बहनों में शरीरिक संबंध बनते हैं। भाई 7वीं क्लास में तो बहन 9वीं क्लास में पढ़ती हैं। घर वालों को तब मालूम पड़ता हैं जब पेट दर्द होने पर बहन को डॉक्टर के पास ले जाया जाता हैं। बालिका गर्भवती निकलती हैं। 

आखिर यह सब क्या हैं... दो मासूमों के मन में ऐसे विचार कहां से पनपते हैं ? कैसे समाज का निर्माण हम आधुनिक युग में कर रहे हैं ? जिसमें ना कोई संस्कार, ना ही नैतिकता। नैतिक मूल्यों की पतन की वजह क्या हैं ? 

कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई की जा रही हैं, अमूमन हर बच्चे के पास लैपटॉप, स्मार्टफोन या टैबलेट हैं। लेकिन क्या आपने कभी बच्चों की गतिविधियों का अवलोकन किया हैं? कहीं पढ़ाई के दौरान अदल्ट् कंटेंट (18+) तो नहीं देख रहे हैं! इंटरनेट के दौर में बच्चों को फ्री हैंड स्मार्ट फोन पकड़ाना घातक साबित हो सकता हैं। ज्यादातर अभिभावक बच्चों की मॉनिटरिंग नहीं करते हैं और अपने कामों में या खुद ही इंटरनेट पर व्यस्त रहते हैं। 

बच्चों की अच्छे संस्कारों के साथ परवरिश अब अति आवश्यक हो गया हैं। क्योंकि वर्तमान युग में एकल परिवार का प्रचलन बढ़ा हैं। संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। दादा - दादी के नहीं होने से माता - पिता की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। 

माता - पिता को इस जिम्मेदारी को समझना होगा। दौलत के लिए भाग दौड़ से वक्त निकालना पड़ेगा। क्योंकि किसी ने कहा कि औलाद से बड़ी कोई दौलत नहीं हैं। औलाद ही माता - पिता का भविष्य हैं।
- अणदाराम बिश्नोई

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