सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्या बैंको का लोन आम आदमी के लिये विज्ञापनो तक ही सिमित है?

बैंको के लोन देने का विज्ञापन आपने जरूर देखे होगें। इन विज्ञापनो को देखकर एक बार तो हम जैसे आम आदमी को तसल्ली जरूर मिलती है की कहीं लोन लेकर छोटे कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं।
जब लोन के पुछताछ के लिए बैंक मैनेजर से बात का सिल-सिला शुरू होता हुआ ,आखिरकार  यह बात का सिल-सिला निराशा का मोड़ ले लेता हैं। कह देते है मेरा ट्रान्सफर होने वाले है या अभी काम ज्यादा हैं एक महीने बाद आना  ,इस तरह के  न जाने मैनेजर और क्या क्या बहाना बनाता हैं।
मेरे साथ भी यही हुआ जब मै अपनी SBI होम ब्रांच(घर के नजदीक) में कॉलेज के द्वारा भेजे कागजात लेकर पत्रकारिता की स्नातक डिग्री के लिए लोन लेने गया।
आखिर क्यो आम आदमी के साथ यह छलावा किया जा रहा हैं। बड़े बड़े उद्योगपत्तियो को हजार करोड़ो में लोन आसानी से मिल जाता हैं। हम जैसे को केवल 4 लाख का लोन देने से भी कतराते हैं, जबकि हम लोन की सारी शर्ते पुरी करते ।

अभी विजय माल्या के बाद नीरव मोदी 11400 करोड़ के आस पास की बड़ी रकम लोन के रूप में डकार कर विदेश भाग गया। उसकी सारी संपति जब्त करे तो भी लोन उसका मात्र 20% रूपया कवर होगा  बाकी 80% रूपये तो कभी नही दे पायेगा। सरकार का तो क्या गया? वो तो अपना पांच साल राज करेगी ,और चली जायेगी। कुछ गया तो देश के ईमानदार लोगो के खुन-पसीने की कमाई के टैक्स का पैसा।

आम आदमी के लिए बैंको का लोन केवल विज्ञपन तक ही सिमित हैं।क्योकि बैंको से लोन लेने के लिए मैनेजर को राजी करना काफी मुश्किल काम हैं। आप और हम जैसे तो कर भी नही पाते हैं। कर पाते है तो सिर्फ वहीं जिनकी नेताओ व बड़ो लोगो से जान पहचान होती हैं। या फिर वही कर पाता है जिनकी खुद की पॉकेट गर्म होती है।
रामनगर उत्तराखण्ड के रहने वाले छोटे कारोबारी एन के ध्यानी बताते है कि  "बैक लोन लेना मतलब लोहे के चने चबाने के बराबर हैं। पिछले 10 साल से लगातार एक रिमोट एरिया उत्तराखंड में अपना इलैक्ट्रानिक उद्योग सुचारू रूप से चला रहा हूँ। और मेरा बैंक पिछले 10 साल से मेरे कारोबार से सन्तुष्ट है। लेकिन मैं जब भी कारोबार को बढ़ाने की कोशिश करता हूँ तो बैंक मैनेजर बहाने बना कर लोन बढ़ाने से टाल देते हैं। सरकार विज्ञापन देकर जनता को गुमराह करते रहती है। वैगैर लेनदेन या जानपहचान के बिना किसी को लोन मिलना बड़ा मुश्किल काम है।"

ध्यानी अकेले इस समस्या से परेशान नहीं हैं ।इस तरह से न जाने कितने छोटे कारोबारी अपने कारोबार को उड़ान नही दे पाते हैं। मुद्दा बड़ा गंभीर हैं। इसलिए सरकार को विचार कर बैंकिंग की लोन प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए कानुन बनाने को सोचना चाहिए।
लेखक व काव्य-सृजनकर्ता पुर्ण चन्द्र कान्दपाल कहते हैं की "बैंक के व्यवहार में जब तक बदलाव नहीं आएगा बैंक नहीं सुधर सकते । नियम के अनुसार बैंक कर्मियों को ग्राहक से शाखा में आने पर नमस्ते कहनी चाहिए । यह भी कहते हैं कि ग्राहक भगवान है । अपवाद को छोड़कर अधिकांश सरकारी बैंक कर्मी ग्राहक को आदमी तक नहीं समझते जबकि गैर-सरकारी बैंक ठीक से व्यवहार करते हैं । याद रखिये आप बैंकों को पुनः निजीकरण की ओर ले जा रहे हैं।"

वहीं, हाल नई दिल्ली में रहने वाले स्व-व्यवसायी संजीव कोहली बताते हैं कि "मै अब तक 6 बैंको में मुद्रा-लॉन के लिए आवेदन कर चूका हुँ..…वो भी LLP पंजीकृत हैं कंपनी....कोई ना कोई बहाना कर के लॉन देने से मना कर देते हैं।"
यह थी कुछ शख्स की व्यथा, अगर आप पुछने निकलोगो तो लाखो लोग ऐसी शिकायते करते मिल जायेगे। अब इसे बैंकिग सिस्टम की भ्रष्ट्रचार को पनाह देने वाली खाँमि न कहे तो और क्या कहे? क्योकि जरूरत मन्दो को लोन दिया नही जाता है और नीरव व विजया माल्या जैसो को लॉन देने के लिए बिना कुछ जांचे , पुरा बैंक ही  उन्हे सौंप देते हैं।
•••••••••
लेखक व सम्पादक : अणदाराम विश्नोई ' पत्रकारिता विद्यार्थी'

--------------------

🆓 आप अपना ई- मेल डालकर हमे free. में subscribe कर ले।ताकी आपके नई पोस्ट की सुचना मिल सके सबसे पहले।
⬇⏬subscribe करने के लिए इस पेज पर आगे बढ़ते हुये ( scrolling) website के अन्त में जाकर Follow by Email लिखा हुआ आयेगा । उसके नीचे खाली जगह पर क्लिक कर ई-मेल डाल के submit पर क्लिक करें।⬇⏬
फिर एक feedburn नाम का पेज खुलेगा।  वहां कैप्चा दिया हुआ होगा उसे देखकर नीचे खाली जगह पर क्लिक कर उसे ही लिखना है। फिर पास में ही " ♿complate request to subscription" लिखे पर क्लिक करना है।
उसके बाद आपको एक ई मेल मिलेगा। जिसके ध्यान से पढकर पहले दिये हुये लिंक पर क्लिक करना है।
फिर आपका 🆓 मे subscription.  पुर्ण हो जायेगा।

आपको यह पोस्ट कैसा लगा, कमेन्ट बॉक्स मे टिप्पणी जरूर कीजिए।।साथ ही अपने दोस्तो के साथ पोस्ट को शेयर करना मत भूले। शेयर करने का सबसे आसान तरीका-
☑ सबसे पहले उपर साइट मे "ब्राउजर के तीन डॉट पर " पर क्लिक करें करें।
☑ फिर  "साझा करे या share करें पर " लिखा हुआ आयेगा। उस पर क्लिक कर लिंक कॉपी कर ले।
☑ फिर फेसबुक पर पोस्ट लिखे आप्शन में जाकर लिंक पेस्ट कर दे।इसी तरह से whatsapp. पर कर दे।
आखिर शेयर क्यो करे ❔- क्योकी दोस्त इससे हमारा मनोबल बढ़ेगा।हम आपके लिए इसी तरह समय निकाल कर महत्वपुर्ण पोस्ट लाते रहेगे। और दुसरी बड़ा फायदा Knowledge बांटने का पुण्य। इस पोस्ट को शेयर कर आप भी पुण्य के भागीदार बन सकते है। देश का मनो-विकास होगा ।
तो आईये अपना हमारा साथ दीजिए तथा हमें "Subscribes(सदस्यता लेना) " कर ले    अपना ईमेल डालकर।
💪इसी तरह देश हित की कलम की जंग का साथ देते रहे।👊

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वेब सीरीज की 'गन्दगी', 'उड़ता' समाज

कोरोना काल में सिनेमा घर बंद हैं। सिनेमा घर की जगह अब ओटीटी प्लेटफॉर्म ने ली हैं। जहां वेब सीरीज की भरमार है। कई फिल्मों भी ओटीटी पर रिलीज हुई हैं। लेकिन कंटेंट पर कोई रोक टोक नहीं हैं। जिसका फायदा ओटीटी प्लेटफॉर्म जमकर उठा रहे हैं। वेब सीरीज के नाम पर गंदी कहानियां परोसी जा रही हैं। जो समाज को किसी और छोर पर धकेल रही हैं।  हाल ही में ट्राई यानी टेलीफोन रेगुलेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने कहा हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म जो परोस रहे हैं, उसे परोसने दो। सरकार इसमें ताक झांक ना करें।  मतलब साफ है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म के कंटेंट पर कोई सेंसरशिप नहीं हैं और ट्राई फ़िलहाल इस पर लगाम कसने के मूड में नहीं हैं। कोरोना काल से पहले भी वेब सीरिज काफी लोकप्रिय थी। लॉकडाउन के दौर में और ज्यादा दर्शक ओटीटी प्लेटफॉर्म की तरफ आकर्षित हो गए। ओटीटी प्लेटफॉर्म का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। अब तो फिल्में भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही रिलीज हो रही हैं। हाल ही रिलीज हुई आश्रम समेत कई फ़िल्मों को दर्शकों ने खूब पसंद किया।  लेकिन कोई रोक टोक नहीं होने से ओटीटी पर आने वाली वेब सीरीज और फिल्मों का कंटेंट सवालों के घेरे में रहत

अच्छे दिन को तरसता किसान

कृषि  को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता हैं,इस तरह की जुमले बाजी करके नेतागण वोट बँटोरने में कामयाब तो हो जाते हैं। परन्तु शुरूआत से ही छोटे,गरीब व मंझोले किसानो को दर-दर  कई समस्याओ से सामना करना पड़ रहा हैं।सरकार के द्वारा किसान-हित में की गई घोषणा-बाजी  की  कमि नहीं हैं, कमि है तो जमीनी स्तर के काम की  । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा चलाई गई ' प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना'  भी कोई खास असर नही दिखा पाई,उल्टे किसानो को लुट कर प्राईवेट बीमा कंपनियो को लाभ पहुचाया गया। किसानो को बीमा कवर के रूप में छत्तीसगढ़ में किसी को 20 रूपये तो किसी को 25 रूपये के चैंक बांटे गये।   वही हरियाणा के किसानो ने सरकार पर आरोप लगाया कि फसल बीमा योजना के नाम पर बिना बतायें ,किसानो के खाते से 2000 से 2500 रूपये तक काटे गये। लेकिन वापस मिले 20-25 रूपये । फसल की उपज लागत ,फसल की आय सें अधिक होती हैं। जिसके कारण दो वक्त की रोटी पाना भी मुश्किल होता हैं। राजस्थान के जोधपुर जिले के रणीसर ग्राम  में रहने वाले किसान सुखराम मांजू  बताते है, "पिछली बार जीरें की फसल खराब मौंसम की वजह से

युवाओं की असभ्य होती भाषा

दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में भाग-दौड़ व रफ़्तार भरी जीवन शैली में चिड़चिड़ापन होना अब स्वभाविक हैं. लेकिन इसके साथ खासकर युवाओं में बोल-चाल की भाषा में परिवर्तन दिख रहा हैं. या यूं कहें आज की युवा पीढ़ी की आपस में बोल-चाल की भाषा असभ्य हो गई हैं. अगर आप मेरी तरह युवा हैं तो इस बात को आसानी से महसूस भी कर रहे होगें. और हो सकता हैं कि आप भी अपने दोस्तों की असभ्य और भूहड़ शब्दों से परेशान होगें. मजाक में मां-बहन से लेकर पता नहीं क्या-क्या आज की युवा पीढ़ी दोस्तों के साथ आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. खैर यह अलग बात हैं कि यह सिर्फ ज्यादातर दोस्तों के समूह में होता हैं.   लेकिन याद रखना , कहीं भी हो. आखिर भाषा की मर्यादा तो लांघी जा रही हैं. यह एक तरह से भारतीय संस्कृति को ठेस पहुंचाना हैं. अगर इसे सुधारने की पहल नहीं की गई तो आने वाले वक्त में यह एक बड़ी समस्या बन जाएगी. गंदे लफ़्ज की जड़ कहां यह  सवाल आपके मन में भी होगा. आख्रिर हम इतने असभ्य क्यों होते जा रहें हैं. यह बात कह सकते हैं कि महानगरों में तनाव व निरस भरी जिंदगी में व्यक्ति परेशानी के चलते अपनी एक तरह