बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

अदनान सामी: अंतरराष्ट्रीय संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध होने से लेकर मोदी के हिमायती बनने तक का सफर

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पद्म पुरस्कारों की घोषणा की।इन नामों में से एक अदनान सामी पर बहस छिड़ी है।
सामी का जन्म 1971 में हुआ। अदनान सामी के पिता पाकिस्तान वायु सेना में पायलट रहे है और बाद ने 15 देशों में पाकिस्तान के राजदूत रहे। अदनान सामी पाकिस्तान के नागरिक रहे है और साल 2015 में जब पाकिस्तान ने उनका वीजा नवीनीकरण का आवेदन खारिज किया तो उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल की।

Adnan swami, Adanan Swami
PC : Adanan Swami Insta.
10 साल की उम्र में उन्होंने लंदन में आर डी बर्मन कॉन्सर्ट में हिस्सा लिया। उन्हें क्या पता था कि इसके बाद उनकी जिंदगी एक अलग ही करवट लेने वाली थी। वहां उनकी मुलाकात आशा भोंसले से हुई और इसके बाद उन्होंने संगीत को अपना सब कुछ दे दिया।


अदनान सामी ने 15 साल की उम्र में अपना पहला गाना गाया जो साल 1986 में मध्य पूर्व का सबसे हिट गाना बना। उसके एक साल बाद उन्होंने यूनिसेफ के लिए गाना लिखा। ये गीत इथोपिया के लिए समर्पित था जो सदी के सबसे भयंकर सूखे से ग्रसित था। इसके लिए उन्हें विशेष पुरस्कार मिला। अमेरिका की एक सम्मानित मैग्जीन ने उनको नब्बे के दशक की कीबोर्ड की खोज कहा।

 एक समय वो भी आया जब उनका वजन 230 किलो तक पहुंच गया था लेकिन उन्होंने 16 महीने में उन्होंने करीब 170 किलो वजन कम किया था। तब भी उनकी बहुत चर्चा हुई थी।
हाल ही में उन्होंने सलमान खान अभिनीत 'बजरंगी भाईजान' में कव्वाली भी गाई। ' भर दो झोली मेरी ' गाने को पूरे विश्व में सराहा गया था। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मैं आपको ' उड़ी उड़ी उड़ी ' सुनने को कहूंगा।

विवाद क्यों?

अदनान सामी ने संगीत के क्षेत्र में बहुत सम्मान कमाया। तो ऐसा क्यों हो रहा की उनको पद्म श्री देने पर विवाद हो रहा है? वहीं दूसरी और कुछ लोग इसे भारत की ' धर्मनिर्पेक्षता ' का उदाहरण बता रहें है।

आइए देखते है कैसे रहे अदनान सामी के भारतीय नागरिक के रूप में 5 साल।

सबसे पहले हम जानते है ट्विटर पर अदनान सामी का प्रदर्शन।

' प्रदर्शन ' जी हां। आज सोशल मीडिया के जमाने में आधी राजनीति ट्विटर पर ही खेली जाती हैं। नेताओं को चाहे सूचना देनी हो या फिर किसी दूसरे नेता पर निशाना साधना हो, युवाओं को धर्म की राजनीति में बांटकर अपना वोट बैंक फैलाना हो या फिर किसी महिला नेता या अभिनेत्री को ट्रोल करना हो, ट्विटर सबके लिए आसान साधन है। 

जैसे ही अदनान सामी की आईडी @AdnanSamiLive खोलते है, उनकी भारतीय झंडे के साथ लगी तस्वीर आपका ध्यान नहीं भी खींचे तो आप उनका परिचय पढ़िए। 
 ' गर्व से भारतीय ' से उनका परिचय खत्म होता है। इसमें कोई गलत बात नहीं है कि उन्हें भारतीय होने पर गर्व है। मैंने खुद अपना परिचय कुछ इसी अंदाज में लिखा है। लेकिन उनके ट्वीट्स देखकर ऐसा लगेगा की ये किसी संगीतकार के नहीं बल्कि बीजेपी के किसी नेता के बयान हैं।
चाहें उनका धारा 370 को हटाने पर समर्थन देना, नागरिकता कानून को सही ठहराने पर उनके बयान या फिर प्रधानमंत्री मोदी के हर बयान का समर्थन करना, वो पाकिस्तानी आलोचकों के निशाने पर रहते है।
पाकिस्तानी ट्रोल उन्हें ' मेजर अदनान सामी ' कहते है और कहते हैं कि वो एक खुफिया मिशन पर है। लेकिन अदनान सामी भी उन ट्रोल पर जबरदस्त तरीके से पलटवार करते है।

बहुत सारे मौकों पर उन्होंने जेपी नड्डा के नेतृत्व वाली पार्टी को खुले आम सलाह दी और बिन मांगी शुभेच्छा भी साथ में दे डाली।

पिछले साल आम चुनावों से पहले उन्होंने ट्वीट किया जिसमें उन्होंने मोदी सरकार को यूपी में महागठबंधन से चेताया था और दूसरी बार जीतने के लिए जिताऊ उम्मीदवार चुनने की सलाह दी।

2013 में अदनान सामी पर टैक्स ना चुकाने का आरोप बीजेपी लगा चुकी है लेकिन भारतीय नागरिक बनने के बाद उन्होंने केवल प्रधानमंत्री का महिमामंडन किया है।

क्या सही मायनों में वे पद्म श्री के हकदार है?
यदि इसका उत्तर सटीक दिया जाए तो होगा, हां ।
अदनान सामी संगीत में बहुत योगदान दिया है। लेकिन ये बात भी कुछ हद तक सही है कि उन्होंने सभी उपलब्धियां पाकिस्तानी नागरिक होते हुए हासिल की। और संगीत में राहत फतेह अली खान शाहब ने भी भारत में काम करते हुए शोहरत और सम्मान पाया। इस तर्क से वो भी पद्म पुरस्कार के हकदार थे।

लेकिन पद्म श्री पुरस्कार मिलने में उनके राजनैतिक विचारों का भी योगदान है। यदि वो राजनैतिक रूप से तटस्थ होते तो शायद बीजेपी के नेतृत्व वाली वाली सरकार उन्हें पुरस्कार देने में हिचकिचाती।

ये एक कटु सत्य है कि भारत में पुरस्कार मिलने में हमेशा ही राजनैतिक हस्तक्षेप होता रहा है। ये अतीत में कांग्रेस नीत सरकार में भी होता था और अभी मोदी सरकार में भी हो रहा है।

पिछले साल ' उरी: सर्जिकल स्ट्राइक ' को नेशनल अवार्ड मिला। फिल्म नेशनल अवार्ड के लायक थी लेकिन ' अंधाधुन ' सही मायने में श्रेष्ठ फिल्म थी। आदित्य धर निर्देशित फिल्म को  राष्ट्रवाद का सहारा मिला और इसी कारण इसे ' अंधाधुन ' के बराबर दर्जा मिला।

लेकिन आज की राजनीति मुद्दे और नीति आधारित ना होकर इस बात पर आधारित है कि कौन बहुसंख्यकवाद के अगुवा के रूप में सामने आता है।

आज राजनीति चेहरे कि लड़ाई हो गई है। जब जब भारत को कोई सशक्त नेता मिला है, चाहे वो इंदिरा गांधी हो या नरेंद्र मोदी, विपक्ष को हमेशा चेहरे के लिए मशक्कत करनी पड़ी है। ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि कभी परिवारवाद आड़े आता है तो कभी जातिवाद। ये ही हमारी देश के नागरिक होते हुए विफलता है कि हम कभी इन मुद्दों से अलग हो ही नहीं पाए। हमारे देश ने आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में काफी सफलता हासिल की है लेकिन सामाजिक स्तर पर हम उतना विकास नहीं कर पाए जितना  हमारे देश के नीति निर्माताओं ने आजादी के समय आस लगाई होगी।
 - हिमांशु यादव

(नोट : यह लेखक के अपने विचार हैं। यह आलेख एक गेस्ट पोस्ट हैं। DelhiTV.in पर गेस्ट पोस्ट के लिए मेल - delhitv@yahoo.com)

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